धन्वन्तरि भाग 15

अलर्क कै वाद वाराणसी चमकी । इसलिए ज्यों-ज्यों वाराणसी का यश बढता गया, साहित्य में उसकी गरिमा बढती गई । बौद्धकाल (ई. पू. 600) में काशी शब्द मंद पड़ गया, वाराणसी ही प्रतिष्ठित थी । विनय पिटक में आठ दस बार वाराणसी का उल्लेख हे । महावग्ग सें भगवान गौतमबुद्ध की धर्म चक्र प्रघर्त्तना का उल्लेख वाराणसी

कं ऋषिपत्तन (सारनाथ) से ही हुआ हे 3 वाराणसी क्रो पाणिनि ने भी लिखा हे और’ महाभाष्यकार पतंजलि ने भी ।

निरुक्त में यास्क ने ऋग्वेद के एक मंत्र की व्याख्या दी डै जिसमें काशी2 शब्द है । परंतु वहॉ काशी शब्द देश अथवा नगरवाची नहीं, प्रत्युत विशेषण हे । यास्क ने क्ताशि’ को संगठित के अर्थ में दिया हैँ । बँधी हुई मुटूठी काशि हे । क्योंकि वह संगठित हे3 । यह धन्वन्तरि का साम्राज्य भी काशी इसीलिए कहा गया क्योंकि वह मुटूठी की तरह संगठित था । यह संगठन टूटते ही काशी एक साम्राज्य नहीं, जनपद मात्र रह गया । सौभाग्य मह है कि वह आज़ तक है ।

जो भी हो, काशी महाभारत से पूर्व एक महान शक्तिशाली राज्य था और महाभारत केउपरात भी उतने जमनी प्रतिष्ठा खोई नहीं थी । भले ही अब वह ‘आसमुद्रातु पश्चिमामू न रहा हो । वह राज्य दिवोदास तक तो धन्व पर्यन्त रहा । तभी दिवोदास का विरुद मी धन्वन्तरि रह सका । र्कितु प्रतर्दन ब्रह्मवादिंता में इतने लीन हुए कि अराजक

३ शक्तियों का दमन न हो सका । पूर्व और पश्चिम दोनों ओर के पर्यंत प्रदेशों में विप्तन् हुए और वे स्वतंत्र राज्य बन गए । सच यह है कि राजनीति मेँ ब्रह्मविद्या, विश्व-प्रेम, अहिंसा और सह-अस्तित्व जेसी बातों का कोई महत्त्व नहीं है 3 इस चवकर में राज्य’शक्ति विद्रोहियों के हाथ चली ही जाती रही हैँ । मनु ने ठीक कहा थर-“दंडद्र शास्ति

प्रजा: सर्वा: ।’ दंड का शासन दुर्बल हो जाने मर भी विद्या का सबल शासन ही आजतक

काशी को जीवित रख सका । विद्या ऐसा धन था जिसे शत्रु नहीं लूट सके, चोर. नहीं चुरा सकै ।

पाणिनि से पूर्व भारत में जनपद युग प्रारंभ ही चुका था । महाभारत कै उपरांत बिध्वस्त राज्य संस्थाएँ अपना क्रमिक विकास नहीं रख सकीं । तो भी पाणिनि से पूर्व (800 ई पू. ) भारत में सोलह ‘महाजनपद’ बने हुए ये । जनपद मूल राजसस्थाऐँ थीं ३ विजित प्रदेशों से विस्तृत राजसंस्याएँ महर-जनपद थे । ये सोलह जनपद राजनेतिक स्वार्थी से कुछ इस प्रकार जुडे ये फि दो-दो कें आठ युराल बन गए ये । उनके नाम इस प्रकार हैं-1 अंग-वंग, 2 काशी-क्रोसल 3 वृजि-मल्ल, 4 चेदि-यत्स, 5 कुरु-पाचाल 6. मत्स्य३शूरसेन, 7 . अप्रमक-अवन्ति, 8 . गंधार कम्बोज ।

पूर्वीय महाजनपदों पर अब भी काशी का प्रभाव था । इतिहास की सूचना फै अनुसार अंगक्वेबंग और मगध के विद्रोह के फलस्वरूप काशी ने उनका दमन किया ५ और उनकी सारी सत्ता काशी के अधीन हो गई । र्कितु काशी का सहयोगी कोसल बढने लगा । लगभग 675 ई. पू. कोसल ने काशी पर आक्रमण कर दिया । प्रसेनजित् कोसल का सम्राट था । काशी क्रो उसने जीत कर महाक्रोसल राज्य बना लिया ।1

सिंहल या ताम्रपर्णी तक दक्षिण तथा मिस्र तक पश्चिम में सार्थवाहों से व्यवसाय करनेवाले वाराणसेय व्यापारियों की स्वर्ण संपत्ति देकर काशी मेँ सरस्वती का शासन फिर भी अक्षुष्ण रहा । विद्वानों की मंडली कोसल नहीँ, काशी ही जाती रही । मगध में जिन शिशुनाक वंशियों का राज्य प्रसिद्ध है, उनका मूल राजा शिशुनाक काशी के राजवंश का ही एक प्रतापी राजकुमार था । प्राय: 727 ईं. पू. यह राजवंश स्थापित हुआ 3 उससे पूर्व महाभारत तक काशी का जीत्न वृतांत पता नहीं क्या रहा ? वास्क (800 ई. पू.) के पूर्व इतिहास के झुटपुटे में साफ-साफ कुछ दिखाई नहीं देता । पर काशी के ३ आदि और अंत देखकर ही मध्य का आभास मिलता हे ।

भगवान बुद्ध का एक प्रवचन स्मरणीय है जिसमें उन्होंने काशिराज ब्रहादत्त का उल्लेख किया है 3 वह इतिहास बड़ा मार्मिक है-“वाराणसी में काशिराज ब्रह्मदत्त बहुत दिन हुए, राज्य करता था । वह महाधनी, महाभोगवान, महासैन्ययुक्त, महावाहनयुक्त, महाराज्ययुक्त और भरे क्रोष्ठत्मार वाला था । उसी समय कोसल में दीधिति नामक राजा राज्य करता था जो दरिद्र अल्पभोग, अल्पसैन्य, अल्पवाहन, अल्पराज्यकोष और अल्पकोष्ठागार वाला था । काशिराज ब्रह्मदत्त ने चतुरंगिणी सेना लेकर कोसल राज दीधिति पर चढाई कर दी । का

दीधिति ने बिचार किया, मैं दुर्बल हूँ अल्पशक्ति होने के कारण ब्रह्मदत्त से टवका नहीं ले सकता । इसलिए अपनी रानी को साथ लेका दीधिति राजधानी (श्रावस्ती) से निवल्ल -भागा । कोसल पर ब्रह्मदत्त का अधिकार हो गया । दीधिति चलते-चलते रानी सहित वाराणसी ही पहुंच गया । एक कोने में किसी कुम्हार कं घर मरिवाजक का रूप धारण कर रहने लगा । इस अज्ञातवास में दीधिति की महिषी गर्भिणी हुई ।

एक दिन दीधिति की गर्भिणी महिषी को दोहद हुआ । वह बोली, देव ५ मैं सूर्योदय कै समय फ्रीड़ाक्षेत्र में सन्माह और वर्म से युक्त चतुरंगिणी सेना को खडी देखना

चाहती हूं और खहूग की धोबन पीना चाहती दूँ । ओर यदि यह न हो सका तो मैं मर जाऊँगी ।

धन्वन्तरि भाग 14

एक चतुर्युगीम्भ32000० वर्ष (तेतालीस लाख बीस हजार) यह सातवाँ वैवस्वत मन्तंतर व्यतीत हो रहा है । उसमें यह अटूठाइसर्वी चतुर्युगी चल रही है । वइतिनुम है, जिसके अब तक 5021 वर्ष व्यतीत हो चुकें हैं । 426979 वर्ष अमी और कलियुग ही चलेगा 1 परंतु इस काल-गणना में धन्तन्तरि अथवा दिवोदास को उचित स्थान पर

बैठा सकना आज कं ऐतिहासिकौं को कठिन प्रतीत हो रहा ठे ।

दिवोदास ने वाराणसी आबाद की तब कलियुग लग गया था । तो क्या वर्तमान ८ क्या के बीते हुए 5021 वर्ष क अंदर ही धन्वन्तरि को बैठाया जाए ? जबकि यह ‘ समय महाभारत युद्ध तक भी कठिनता से पहुंचता है । धन्वन्तरि महाभारत से बहुत पूर्व के महापुरुष हैं । यदि कहा जाए कि धन्वन्तरि छब्बीसवीं चतुर्युगी कं कलियुग में हुए थे । तब क्या अड़तीस लाख तिरानवे हजार इक्लीस (3893021) वर्ष पहले मन्वन्तरि हुए? यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसके बाद सत्ययुग, त्रेता और हापर का इतिहास कहाँ है? द्वापर में महाभारत हुआ था और धन्वन्तरि महाभारत से पूर्व । क्योकी महाभारत में धन्वन्तरि का इतिवृत्त है । तब हरिवंश पुराण का कलियुग कौन सा ? आधुनिक ऐतिहासिक साँचे में हरिवंश पुराण का कलियुग नहीं ढलता ।

धन्वन्तरि का आविर्भाव उपनिषद और ब्राह्मण काल से पूर्व की घटना है । कठोपनिषटू में नचिकेता फे पिता का नाम आरुणि दिया है । कठोपनिषद, आरुणि के पुत्र नचिर्वन्ता के जीवन की घटना है । काठक संहिता में दिवोदास और आरुणि का संवाद _ है ।1 इस प्रकार उपनिषद काल से पूर्ब धन्वन्तरि और दिवोदास हो चुके ये । उपनिषदों में यह संवाद पुराणों से लिया गया हो सकता है क्योकि पुराणों की रचना ही उपनिषदों से प्राचीन है । छाद्रोग्य उपनिषद में सनस्कूमार से ब्रहा विद्या सीखते समय अपनी अधीत विद्याओं का ब्योरा देते हुए नारद ने कहा था कि ‘इतिहास और पुराण, जो पाँचवें वेदमाने जाते हैं, मैंने उन्हें भी पढा है ।’2

पौराणिक साहित्य भारतीय वाडड्डूमय का स्वतंत्र बिषय है । उसका उल्लेख अथर्ववेद मैं पी है । क्रिक, साम, यजु अथर्व और पुराण उसी ज्ञान रूप परमात्मा से उत्पन हुए ।”3 इस प्रकार यह स्पष्ट हे कि उपनिषद काल (ई. पू. 600) में पुराणों की सत्ता तो यी ही, क्य वैदिक काल में मी एक विकसित साहित्य था । ब्राह्मण ग्रंथों में इसीलिए दिवोदास बौर उनके पुत्र प्रतर्दन (युनान) का स्थानंस्यान पर उल्लेख है । वेदिक काल कै पूल क्या का सप क्या था? यह अब प्राप्त नहीं ।

पाणिनि ने काशी’, याराणसी3 का उल्लेख भारत के प्रसिद्ध स्थानों में किया है । क्या: पाणिनि से बहुत पूर्व काशी और वाराणसी का यश फैल चुका था, जिन्हें काश

और दिवोदास ने आबाद किया था । पाणिनि ने भी काशी शब्द जनपद-वाची अर्य में, और वाराणसी नगर-वाची अर्य में लिखा हे । वाराणसी राज्य की राजधानी थी । पाणिनि जनपद-युग के व्यक्ति ये । काशी उनके युग मेँ जनपद (राष्टीय-प्रांत) था । विईसु वे और पुराने दिन थे जब काशी साम्राज्य “आ समुद्रातु वे पूवदिरसमुद्रातु पश्चिमान्’ एक चक्रवर्ती शासक के अधीन था जिसके सम्राट धन्वन्तरिं थे ।

पाणिनि ने ‘वाराणसेय‘ भले ही लिखा हो, र्कितु प्राचीन ब्राह्मण ग्रंथों में वाराणसेय कोई नहीं था,-वे महापुरुष “काश्य’ कहे जाते ये ।1 संभवत: यह दिवोदास से पूर्व के महापुरुष हैं । क्योंकि वाराणसी दिवोदास ने आबाद की थी । उससे पूर्व साम्राज्य भी काशी और राजधानी भी काशी । धन्वन्तरि उसी युग क्री विभूति थे । सुश्रुत ने धन्वन्तरि को कहीँ वाराणसेय नहीं लिखा । वहाँ सर्वत्र ‘काशिपति’ विशेषण प्रयुक्त है 3 गीता में भी ‘काशिराजस्तु वीर्यंवान’ ही तिखा हे । अर्थात् महाभारत कै समय भी वाराणसेय कहना उतना सम्मानपूर्ण न था जितना ‘काशिंपति’ । जो कोई वाराणसेय रहे हौं…धन्वन्तरि ‘काशिपति’ से ही गौरवान्वित होते हैँ । वह काशी जो धन्व3 तक शासन कर रही यी ।

काठक संहिता मेँ दिवोदास तथा आरुणि का संवाद दिया गया हे । हम पीछे उसका उल्लेख कर आए हैं । बृहदारण्यक मेँ आरुणी और याज्ञवल्का का संवाद हे । जनक और याज्ञवरुक्य का भी । मैत्रेयी और कात्यायनी दोनों पत्मियों के साथ याज्ञवल्का का संवाद, अरुणि कं पुत्र और नचिर्वन्ता के भाई श्वेतकेतु का पांचाल सम्राट प्रवाहण जेवालि से संवाद, यह सारे संवाद गार्व्य और काशी कं अजातशत्रु सम्राट के संवाद के साथ उद्धृत किए गए हैं । संवादों की परिस्थितियाँ प्रकट करती हैं, ये सरि महापुरुष एक ही युग में हुए । ऐसी दशा मेँ काशी के ‘अजातशत्रु’ दिवोदास ही प्रतीत होते हैँ । परन्तु इस अजातशत्रु को भी लूटने वाले शत्रु चेदि कै हेहय वंश में उत्पन्न हो ही गये । दिवोदास की वाराणसी लुट गई । उसका सुहाग लुट जाने पर दिवोदास को ‘वाराणसेय’ कैसे कहा जाता? दो पीढी बाद अलर्क उसे फिर श्री संपन्न कर पाया ।

धन्वन्तरि भाग 13

दृढ प्रकार स्वर्ग भ्रष्ट देखकर प्रतर्दन ने कहा, “हे पुरुष श्रेष्ठ र में अपने समग्र पुण्य देकर आपकी फिर स्वर्ग पहुंचाना चाहता हूँ । बताइए मेरे पुण्य से कितने लोक उपार्जित हैं? क्याति ने उत्तर दिया, “प्रतर्दन १ तुम्हारे पुण्य से इतने लोक विजित हैं, यदि तुम उनमें प्तात-सात दिन ही रहो, तो उनका अंत न मिलेगा, परंतु हे साधु ष्ट में तुम्हारा पुण्य लेकर स्वर्ग का सुख नहीं लेना चाहता ।’1

हरिवंश पुराण कै अनुसार दिवोदास ने वाराणसी क्रो शत्रुओं से छीनकर फिर आबाद कर दिया था । र्कितु दिवोदास कं पुत्र प्रतर्दन कं शासन में वह फिर शत्रुओं नेबिध्वस्त कर दी । प्रतर्दन और प्रत्तर्दन कँ पुत्र वत्सराज उसे अपने जीवन में फिर न वसा सके । वत्सराज के पुत्र आलर्क ने शत्रुओं का डटकर मुकाबला किया और वाराणसी को फिर से श्रीसंपन्न कर दिया र शत्रु की हुंकार के समक्ष अहिंसा, सहिष्णुता और विश्वबंधुत्व कं आदर्श बघारने वाले राष्ट्र सदैव दुर्बल, भीरु और कायर समझे गए हैँ । अतिथि का सत्कार शास्त्र द्धारा और शत्रु का सत्कार शस्त्र द्वारा ही होना चाहिए । आलर्क ने वही किया । . . _

इतिहास के पर्यालोचन से यह स्पष्ट है कि काशी के विरुद्ध कभी कोसल, कमी मगध और कभी मौर्य, गुप्त, शुभ और कान्यकुब्ल कं आक्रमण होते रहे हैं । इस गृहक्लह ने आर्यावर्त के उस विशाल साम्राज्य को, जिसे धन्वन्तरि ने भूमध्य एशिया के घन्व कै अंत तक विस्तृत कर दिया था, अब खंड-खंड कर दिया 1 गृल्फाह से किसी कैधर आजतक आबाद नहीं हो सकै, वे बरबाद ही होते हैं । महाभारत के समय तक काशी का पराक्रम सजीव था । इसको प्रमाणित करने के लिए गीता का यह वाक्य ही पयप्तिहे-‘काशिराज़स्तु वीर्यवान’ । तब तक काशी में शस्त्र औंर शास्त्र दोनों प्रतिष्ठित थे ।

बौद्ध काल में भी वाराणसी एक प्रतिष्ठित नगर था । बौद्ध ग्रंथों में वाराणसी का वहुत उल्लेख है । भगवान बुद्ध ने अपने धर्मचक्र की प्रतिष्ठा सबसे प्रथम वाराणसी के ‘ऋषिपत्तन‘ नामक स्थान पर ही क्री थी । वह स्थान जहौं आज सारनाथ है । भूगर्भ से प्राप्त णान बुद्ध का वह आसन वहाँ आज भी रखा हे ।

पाणिनीय एवं बौद्ध साहित्य के आधार पर यह ज्ञात होता है फि ‘काशी’ राज्य माँगी शब्द है तथा वाराणसी नगरी वाचक । तात्पर्य यह कि वाराणसी काशी राज्य की क्या थी । र्कितु काशी की प्रतिष्ठा ने वाराणसी नाम को इतना आवृत्त कर लिया किणाराणसी का नाम भी काशी ही हो गया ।

पुराणों, ग्राडाण ग्रंथों एवं महाभारत में काशी का उज्जवल इतिहास सुरक्षित हे १ क्या ने जिस आलंकारिक भाषा में वह लिखा गया है उसे घटनाओं के अनुरूप समन्वित कानै में हम इतिहास कै तथ्यों का परिज्ञान कर ही सकते हैं । हम काशी और वाराणसी

कै लिए यह नहीं कह सवस्ते कि वह उपन्यासों की कल्पनाएँ हैं । फिर उसके शासक काल्पनिक सत्ता के कैसे कहे जाएँ ? अमृत का कलश, समुद्र का मंथन और विष्णु फा अवतार साहित्यिक हैं, उन्हें इतिहास की भाषा मेँ लाइए । पुराण साहित्य के रचयिताओँऩे अपनी रचनाओं का स्पष्टीकरण देते हुए स्पष्ट कहा था

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशी, मन्तंतराणि च ।

वंशानुचस्तिठचैव पुराणं पंचधामतम् ।

  1. सर्ग (सृष्टि की उत्पति), १ प्रतिवर्ग, (सृष्टि का विलय), 3० सृष्टि के वंशवृक्ष,
  2. मन्तंतरों का कालक्रम, 5 वंशजों के चरित्र-यह पॉच विषय पौराणिक साहित्य में वर्णन किए गए हैं । भारतीय विचारधारा मैं एक ही मिशन कै लिए जीने मरनेवाले मरुणुरुष एक दूसरे के क्रमश: अवतार हैं । यह ऋग्वेद के देवतावाद का ही प्रतिबिंब हैं-“एक्रोदेव्रद सर्बधूतेपुगूढ़ट्वे” फिर अग्निपुराण के इस उल्लेख मैं कोई असंगत बात नहीं है-कि ‘आयुर्वेद के प्रवर्तक, अमृत कलश लिए द्वा श्र्वन्तरि सपुद्र मंथन के समय बिष्णु कै अवतार हुए ।’1

धन्वन्तरि का समय

५ हरिवंश पुराण में लिखा है कि दिवोदास ने वाराणसी की स्थापना कलियुग में की । यह कलियुग कब से प्रारंभ दुआ ११ क्तिने वर्ष का होगा ऱ यह प्रश्न विवादास्पद ठी रह जाते हैं । सूर्य सिद्धांत के आधार पर युगों की कालगणना का उल्लेख ऋषि दयानंद सरस्वती ने ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका में किया है । चौदह मन्वतेर होते हैं, प्रत्येक मन्तंतर में एकहत्तर चतुर्युगी । प्रत्येक चतुर्युगी में सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग का समय 432000० वर्ष होता है, जिसका विवरण इस प्रकार है

  1. सत्ययुग 1728000 2. बेता 1296000 3. द्वापर 86400० 4. कलियुग 432000

एक चतुर्युगीम्भ32000० वर्ष (तेतालीस लाख बीस हजार) यह सातवाँ वैवस्वत मन्तंतर व्यतीत हो रहा है । उसमें यह अटूठाइसर्वी चतुर्युगी चल रही है । वइतिनुम है, जिसके अब तक 5021 वर्ष व्यतीत हो चुकें हैं । 426979 वर्ष अमी और कलियुग ही चलेगा 1 परंतु इस काल-गणना में धन्तन्तरि अथवा दिवोदास को उचित स्थान पर

धन्वन्तरि भाग 12

उसे तक्षशिला जाना पड़ा । जो भी हो, ब्रह्मदत्त अपने पूर्वज स्वनामधन्य धन्वन्तरि की आयुर्वेद परंपरा को इस समय भी अक्षुण्य रखे हुए थे ।

घन्वन्तरि को वीरता और बिद्धत्ता दोनों ने प्रतिस्पर्धा के साथ संपूजित किया । वे बिष्णु के अवतार थे, इसलिए लश्मी तो उनकी चिरसंगिनी धी ही । वीरता ने उन्हें रुद्र के रूप में प्यार किया, विद्वत्ता ने ब्रह्मा के और लश्मी ने बिष्णु के रूप में उनका आतिमन कर एक ही व्यक्ति क्रो त्रिदेव का प्रतिरूप सिद्ध कर दिया ।

धन्वन्तरि के पुत्र कॅतुमान और पौत्र भीमरथ में वह विशेषता न आई । गृहकलह की ज्वाला सुलगने लगी । सुलगती हुई इस ज्वाला से निकलने वाले धुएँ ने काशी का प्रकाश धूमिल कर दिया । भीमरथ के पुत्र दिवोदास ने काशी के इस गिरते हुए सितारे क्रो फिर से आलोकित किया । र्कितु फिर भी आर्यावर्त वो घर-घर में उनके नाम की आहुति न पढ़ सकी । हरिवंश युराणा और महाभारत2 में लिखा है कि काशी पर कुछ काल आक्रान्ताओं का अधिकार हो गया और दिवोदास को काशी के समीप ही वाराणसी नाम से एक और नगरी बसानी पडी ।

वरुणा और असी नदियों कं बीच आबाद यह नगरी एक भव्य स्थान बन गया । हरिवंश पुराण के लेखानुसार वाराणसी पहले से बसी हुई यी, दिवोदास ने उसे भव्य ” ” रूप देकर राजधानी बना दिया । विजु महाभारत3 के अनुसार दिवोदास ने ही वाराणसी को आबाद किया था । इस प्रकार काशी और वाराणसी दो नगरिर्यों अत्तार-अलग थीं । पुरानी राजधानी काशी थी, दिवोदास का राज्याभिषेक यहीँ हुआ । महाभारत में उन्हे’ फाशीराज ही लिखा गया है । सुश्रुत संहिता में भी प्रत्येक बार उन्हें काशीराज ही क्या गया 3 अपने गुरु विश्वामित्र को आठ सी श्यामकर्ण घोड़े गुरुदक्षिणा में भेंट करने कै लिए मालव काशीराज दिवोदास कै पास ही याचना करने गया था 3 दिवोदास ने दो तो श्यामकर्ण घोडे गालय को दिए थे और गालय ने उसके बदले ययाति की सुंदरी क्या माधवी दिवोदास फो प्रदान की ।

घन्दन्तरि के युग की काशी और दिवोदास की मसाई गई वाराणसी के बीच मेदक रेखा खीचना अब कठिन है । हरिवंश पुराण के अनुसार वाराणसी पहले से उजड्री

हुई नगरी यी, दिवोदास ने उसे फिर से आबाद किया था और दिवोदास कै द्वारा समृद्ध वाराणसी उन्हीं के जीवन में फिर अस्तव्यस्त हुई । दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन ये । वह उच्च कोटि का व्रह्मवादीं विद्वान थे । प्रतर्दन कै पौत्र आलर्क ने उजडी हुई वाराणसी फिर से श्री संपन्न की ।

काश का स्थापित राज्य काशी था और उसकी राजधानी भी काशी नगरी । राज्य का नाम काशी और राजधानी का नाम भी काशी । व्यवहार में कुछ कठिनाई अवश्य अखी हे । इसलिए वरुण और असी नदियों के मध्य बसी हुईं राजधानी वाराणसी नाम से घोषित कर दी गई । संभवत यह घोषणा दिवोदास ने की थी ।1 और इंद्र के अनुशासन से यह व्यवस्था हुई ।

चेदि (छोटा नागपुर-रीवा) के हैहय वंशी राजच्चा काशी राज्य से शत्रुता रख रहे थे । दिवोदास को विद्याबिलास में व्यस्त देखकर डैहय राज ने काशी पर आक्रमण कर दिया । दिवोदास युद्ध के लिए तैयार न ये । हेहय नरेश की सेना ने वाराणसी उजाड दी । दिवोदास वाराणसी छोडकर कौशम्बी (प्रयाण) के समीप महर्षि भरद्धाज की शरण में रहने लगे । वहॉ रहकर भी दिवोदास का विद्याव्रत अटल था । र्कितु राज्य के पुनरुद्धार की योजना से वे उदासीन न ये ।

अभी तक दिवोदास कं कोई पुत्र न था । महर्षि भरद्वाज के आश्रमवास के दिनों में उन्होंने भारद्वाज के आदेशानुसार पुवेष्टि यज्ञ किया । इस यझीय चिकित्सा कै उपरांत दिवोदास की परम सुंदरी पली माधवी ने पुत्र को जन्म दिया । यह परम विद्वान एवं प्रतापी प्रतर्दन थे 3

अपने पूर्वजों की माँति ही प्रतर्दन भी उच्चकोटि का विद्धान था । उपनिषदों और ब्राह्मण ग्रंथों यें प्रतर्दन कै बिचार अंतिम सिद्धांत स्वीकार किए गए ।3 प्राण और आत्मा कै स्वरुप निर्णय पर प्रतर्दन के विचारों का अतिक्रमण न हो सका । आयुर्वेद संहिताओं कै शारीर स्यान की यह प्रस्तावना ठी मानव के सर्ग, स्पिति ओर निर्माण का वह विज्ञान हे

जिस पर भारत को गर्व है । वह मी प्राणाथार्य की सीमा कै अंतर्गत हीं हे । प्रतर्दन के नाना ययाति एक यार स्वर्ग से षस्पिकृत्त कर दिए गए ये ।

धन्वन्तरि भाग 11

भागवत में लिखा है कि धन्वन्तरि के वंश में अनेक पीढियों कै उपरांत गंभीर टाम का सम्राट हुआ । गंभीर का मुत्र अक्रिय था । र्कितु अक्रिय की संतानें क्षत्रिय नहीं रहीं, वे ब्राह्मण हो गई ।1 इस प्रकार इस वंश की राजकीय प्रभुसत्ता क्षीण ही गई ।

हरिवंश पुराण में समुद्र मंधन का उल्लेख है । लिखा है कि समुद्र मंथन से ‘अज’ देवता का आविर्भाव हुआ । धन्व ने इस देवता की भक्तिपूर्वक आराधना की । प्रसन्न होकर वही देवता धन्वन्तरि का अवतार लेकर धन्व का पुत्र धन्वन्तरि हो गया । यह अज्ज देवता सोम है । सोम का अधिष्ठातृ देवता इंद्र कहा गया है 3 इंद्र और उपेंद्र (विष्णु) दोनों सहोदर भाई थे । पौराणिक मान्यता यही है कि धन्वन्तरि विष्णु के अवतार वे । वह अमृत लेकर अवतीर्ण हुए । हम पीछे लिख आए हैं कि सुश्रुत संहिता में अमृत के प्रयोग का मूल उपादान सोम ही लिखा है । सोम क 28 भेदों में एक भेद चंद्रमा नाम का गी है जो समुद्र मंथन के समय आविर्मूत ढुअर । इस प्रकार इस सारी कथा का अभिप्राय केवल इतना है कि समुद्र मंथन के समय अमृत क प्रयोग का अधिष्ठातृत्व केवल धन्वन्तरि कै पास था । जैसा कि सुश्रुत संहिता में उल्लेख है । भारतीय बिज्ञान को दार्शनिक रूप देकर पुराणों ने अनंत देवताओं का अवतार लिखा है । अग्नि, वायु जल, पृथ्वी, औषधि, अन्न आदि सब देवता हैं । र्कितु भारतीय दर्शन का वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह है कि जगत् क अनंत देवता किसी एक महान् देवता क अवयव हैँ ।3 इसलिए प्रत्येक देवता का वैज्ञानिक दृष्टि से विश्लेषण कीजिए । देवत्व की ऊँची उडान में घनन्तरि कै व्यक्तित्व को खो देना बुद्धिमानी नहीं ।

घन्वन्तरि और काशी

सुश्रुत संहिता से ज्ञात होता है कि धन्वन्तरि की राजधानी काशी थी-त्काशिराजं ल्यात्तरिमू” । अनेक बार उम्हें काशिराज लिखा गया 3 इसलिए यह असंदिग्ध है कि क्लन्तरि फप्सी कै सम्राट ये । धन्वन्तरि कँ प्रपितामह काश थे, जिन्होंने इस काशी क्या ओर काशी राज्य की स्थापना की यी । काश के अनंतर उनके पुत्र, पौत्र सभी

वीर सेनानी थे । उन्होंने इस राज्य क्रो समृद्ध किया और धन्चन्तरि ने तो उसे ” पूवदिस्नासमुद्रानु पश्चिमान्’ कर दिया । विद्या व पराक्रम की सम्मिलित राजधानी काशी रही हे ।

आत्रेय पुनर्वसु के लेखों में भी काशी का कई वार उल्लेख है । ‘तदनंतरं काशिपतिव्र, ‘काशिराजस्य संशयानू”1 आदि उल्लेख यह सूचित करते हैं कि विद्धन्मडैली में काशी का स्थान सदैव ऊँचा रहा है । ब्रह्मविद्या, राजनीति, धर्मशास्त्र, विज्ञान आदि सभी विषयों में काशी के सम्राटों ने जो गौरव भारतीय इतिहास क्रो प्रदान किया, वह अद्वितीय है । गीता का प्रारंभ करते हुए भगवान कृष्ण ने कहा थऊ-‘परंब्वक्रमी काशिराज पांडवों के पक्ष में ये 3 इसलिए काशी कंवल विद्यापीठ रही है, यह कहना पर्याप्त नहीं हे, वह “पराक्रम पीठ’ भी रही है । यह स्पष्ट सत्य है कि काशी राज्य में रहनेवाले लोग बिस्तरों ॰ पर पड़े-पड़े नहीँ मरे, वे विद्या और राष्ट्र के लिए कुछ करते-करते मरे और इस प्रकार मरनेवाले निस्सदेह अमर हैं ।

पाणिनि ने अष्टाध्यायी में (ई॰ पू. 700) काशी का उल्लेख किया है ।3 बौद्ध जातकों में काशी कं युवराज ब्रहादत्त का तक्षशिला के विश्वविद्यालय में आयुर्वेदाध्ययन का उल्लेख है । पुराणों में काशी का विस्तृत वर्णन है । शिवपुराण का काशी वर्णन भी उल्लेखनीय है । उपनिषदों में काशी के सम्राट अजातशत्रु का ब्रहावेत्ता’ओँ मेँ प्रथम स्यान रहा है ।”३ महाभारत में काशी का स्थान-स्यान पर वर्णन उस काल में भी उसकी प्रसिद्धि का प्रमाण है । काशी के सम्राट सुवर्ण वर्मा की राजकुमारी वपुष्टमा इंद्रप्रस्थ के सम्राट जन्मेजय की रानी थी 3 इस प्रकार इतिहास के प्रत्येक युग में काशी का गौरव अक्षुण्य रहा है । गौरव के इन शिखरों की आधारशिला रखनेवाले भगवान घन्वन्तरि ही ये ।

धन्वन्तरि, दिवोदास, वार्योंविद, वामक और ब्रहादत्त आदि धुरंधर प्राणाचार्य काशी में हुए हैँ । यह सव धन्वन्तरि कै वंशज ही ये । ब्रह्मदत्त भगवान बुद्ध के पूर्व हुए (626 वर्ष ईं. पू) थे । र्कितु उम्हें आयुर्वेद का अध्ययन करने तक्षशिला के विश्वविद्यालय जाना पड़ा था । वाल्दीक के कांकायन, पुष्कलावती कै गौष्यन्तावत, कुंतीभोज के भोज,

काशी में आयुर्वेद का अध्ययन करने आते ये । यह समी दिवोदास कै शिष्य थे । बिर्दतु इंसा से 626 वर्ष पूर्व काशी कै राजकुमार ब्रह्मदत्त को अध्ययन की वे सुविधाएँ काशी

धन्वन्तरि भाग 10

देवों ओर असुरों के बीच क्षीरसागर के प्रश्न पर होनेवाले मंथन का यहीँ अभिप्राय है । धन्वन्तरि ही इस मंथन के अधिष्ठाता थे । राष्ट्र जीवन के बँटवारे में आने वाले सारे तत्त्व इतिहास कै पृष्ठों में अमर हो गए, क्योंकि धन्वन्तरि का अमृत उनकें साथ था । भले ही धन्वन्तरि का अमृत मर गया, र्कितु वह धन्वन्तरि को अमर कर क्या ।

प्रतीत होता हैं कि धन्वन्तरि के पिता ने पारसीक कै पश्चिम ईराक तक बिजय की । वह प्रदेश धन्व से लू गया है । इसलिए उनका विरुद धन्व ही रहा । किंतु उनके बेटे ने धन्व के अंत तक विजयश्री का डंका बजा दिया, इसलिए उसे धन्वन्तरि का गौरव प्रदान किया जाना उचित ही था । उल्हण ने अपनी सुश्रुत व्याख्या में श्वनुदृ‘ का अर्थ शल्यशास्त्र लिखा हे और चूँकि धन्वन्तरि शत्यशास्त्र के पारंगामी विद्वान थे अतएव उन्हें ‘धन्वन्तरि’ पदवी से अलंकृत किया गया ।1 यह व्याख्याकार का प्रौढिवाद हे । ‘धनु’ का अर्थ शल्य शास्त्र कैसे हुआ । यह स्पष्टीकरण लिखना शेष रह गया । तो भी उल्हण जेसे आचार्य की बात को गंभीर विचार मुद्रा में मनन करने की आवश्यकता है । इसमें तनिक भी सदेह नहीं कि धनवंतरि के युग में काशी ही आर्यावर्त . की राजधानी यी । विश्व” कै सबसे बड़े सभ्य और समृद्ध देश के सम्राट धन्वन्तरि थे । हुँश्रुत ने ठीक लिखा हे । धन्वन्तरि धर्मपरायण ही नहीं इंद्र के तुल्य पराक्रमी भी हुए । माता ड्डूदुछ प्राचीन लेखों में धन्वन्तरि के पिता का नाम धन्व नहीं “धनगुप्त’ पाया

श्रीमदूमागवत् पुराण में धन्वन्तरि कै वंश का वर्णन कुछ भिन्न क्रम से दिया क्या है । वह देखिए३

  1. क्षत्र वृद्ध 2. सुहोत्र

3, काश्य 4. काशि

काशी जेसे समृद्ध साम्राज्य की नींव डालकर महाराज काश (काश्य) )ने जो विशाल राष्ट्र निर्माण किया, भगवान् धन्वन्तरि ने विद्या एवं बिज्ञान के अक्षय हैंपच से सुसज्जित कर उसे वसुधा का स्वर्ग बना दिया । और महाराज दिवोदास ने इस स्वर्ग का अनूठावैभव विश्व क्रो वितरित करके अपने वंश के यश की धवल ध्वजा इतिहास कं शिखर पर गाढ़ दी । वह आज भी उनकर परिचय दे रही है । भले ही भारत कर प्राचीन इतिहास अंधकार में चला गया हो, किंतु दिवोदास और धन्वन्तरि उसके उज्जाल प्रकाश’स्तंभ हैँ । प्रतिवर्ष उन्हों की स्मृति में हम धन्वन्तरि त्रयोदशी (धनतेरस) का पर्व मनाते हैँ । इस दिन प्रत्येक भारतीय नए पात्र खरीद कर लाता है । उनमें पूजीचित पकवान रखकर धन्वन्तरि के नाम की आहुति देता है और फिर उनमें से एक-एक ग्ररससंपूर्ण परिवार के व्यक्ति इसलिए खाते हैँ कि वह धन्वन्तरि का प्रसाद हे । उन” पात्रों से लिया गया एकएक ग्रास एक-एक चूँट हमारे जीवन में उस अखंड राष्टीयता का उदूबोधन करता है जिसके अमर देवता धन्वन्तरि हैँ ।

यह वह देवता थर जिसने काशी को तीर्थ बना दिया । जिसकी नगरी में मृत्यु पाकर भी भारतीय राष्ट्र का जनन्जन अपने आपको मुक्ति का अधिकारी मानता रहा है और जिसे भगवती सरस्वती ने अपना अक्षय आवास बनाया धर । ब्राह्मण, उपनिषदू, दर्शन, आयुर्वेद, इतिहास और पुराण आदि भारतीय साहित्य की कोई ऐसी शाखा नहीं है जिसमें इस राजवंश के यशस्वी महापुरुषों के संस्मरण न हों । पृ

श्रीमदूभागवत् के अनुसार धन्वन्तरि कर जन्म पुरूरवा के वंशे में हुआ थर । यही चंद्रवंश था । भृगु, जमदग्नि और परशुराम जिस वंशं के महापुरुष थे उसी में धन्वन्तरि भी हुए ये । ऋग्वेद में त्तत्वदर्शियों में प्रख्यात शौनक भी धन्वन्तरि के पूर्वज ही थे । श्रीमटूभागवत् कै अनुसार धन्वन्तरि का वंश हम पीछे लिख आए हैं । हमने कंवल बारह पीढियों ही यहॉ उद्धृत की हैँ । भागवत में उसकी लंबी परंपरा दी है ।1

वह युग था जब जन्म से नहीँ कर्म से ही व्यक्ति अपने वर्ण की व्यवस्था करता था । एक ही वंश में कोई ब्राह्मण कोई क्षत्रिय और कोई वैश्य मिलते हैँ । कुछ वे हैं जो केवल ज्ञरन-बिज्ञरन के ही धनी ये । कुछ ऐसे जो विद्वान भी और योद्धा भी । ज्ञान’विज्ञान कै धनी देवर्षि और विद्वान होकर भी योद्धा होनेवाले राजर्षि कहलाए र विद्वान होते हुए धन-धरन्य में दत्तचित्त रहनेवाले वेश्यथंर्ण में गिने गए । इसीलिए प्राचीन समाजशास्तियों ने कहर थर ‘गुणा सर्वत्र पूङ्कधन्ते पितृवंशी निरर्थक० ।’

धन्वन्तरि भाग 9

महापुरुषों ने स्वर्ग और नरक का भेद ही समाप्त कर दिया था । विशाल आर्यावर्त का साम्राज्य बन चुका था । जिसमें स्वर्ग और नरक का विलय हो गया था । सारे आर्यावर्त का गणनायक अब भी इंद्र ही था । क्रितु शर्त यह थी कि जिसने सौ यज्ञ पूर्ण कर लिए हों हो वही चुना जाएगा । सारे राष्ट्र में इंद्रासन पाने के लिए इस कठिन परीक्षा में होड थी 3 तो अश्वमेध यज्ञ साधारण बात न थी । विशाल आर्यावर्त्त में, प्रशांत महासागर से भूमध्य सागर तक त्रिबिष्टप से चिंध्यादि पर्यंत एक-एक सेनानी इस होड में खड़ा हुआ, किंतु घन्वन्तरि ने यज्ञ का अश्व कभी नहीं छोड़ा । वे सेवा का कठोरतम व्रत लेकर (धन्व) असीरिया क्री मरुस्थली के पार (अश्तरि) पहुंच गए । इस विशाल प्रदेश में अमृत का प्रयोग प्रस्तुत करने वाले एकमात्र धन्वन्तरि ही थे । सुश्रुत संहिता में “स्वभाव व्याधि प्रतिषेघनीय रसायनं’ कं अध्याय में यह प्रसंग लिखा गया हे । आयुर्वेद में प्राप्त होनेवाली किसी अन्य संहिता में यह विज्ञान नहीं है ।

अब अमृत निर्माण की कला धन्वन्तरि के पास ही रह गई थी । स्वर्ग की बातें पुरानी हो गई 3 धन्वन्तरि ने उसमें जो नवीनता प्रस्तुत की, वह विज्ञान असुरों के पास भी न था । तभी तो असुर अमृत क्री त्तिप्ला में लड़े ।

चंद्रमा, औषधि, सोम और अमृत, यह सब नाम वैज्ञानिक दृष्टि से अतद्रसयधित्त हैं । इनके भी अवांतर अनुसंधान के उपरांत, धन्वन्तरि ने चौबीस प्रकार के सोम प्रस्तुत किए थे । यह सारे तुल्य गुणकारी ये, जिनसे अमृत का निर्माण होता था । चंद्रमा नामक सीम, जिसके द्वारा अमृत बनता था, सोने कॅ समान वर्ण के पत्तों और टहनियों से सुनहरा या । वह सदैव जल में ही पनपता था ।3 इनका विस्तृत विवरण हम “धन्वन्तरि की खोज’ प्रसंग में लिखेंगे । यहॉ तो लिखने का अभिप्राय यह हे कि समुद्र में से चंद्रमा निकला,

यह उपाख्यान इस अर्थ में सत्य है कि चंद्रमा नाम का सोम ही समुद्र में प्राप्त हुआ । ऐरावत मी एक औषधि का नाम है

समुद्र मंथन कै इस उपाख्यान में प्रत्येक तत्त्व का वुद्धिगम्य समन्वय उपर्युक्त नामों का प्रामाणिक समन्वय होने पर ही निर्भर है ।

स्वर्ग कै सोम-पीथिर्यो में बड़े-बड़े लोग ही सम्मिलित हो पाते थे । एक बार तो अश्विनी कुमारों को भी उस दावत में सम्मिलित नहीं होने दिया गवा था । इसीलिए अश्चियों ने प्रथम बार अमृत का प्रयोग स्वर्ग मेँ निर्माण किया था । किंतु स्वर्ग से उतर कर वह प्रयोग धन्वन्तरि को ही ज्ञात था । असुर इस अमृत पान में सम्मिलित नहीं किए ” जाते रहे ।1 हो सकता हे कि असुर इसी प्रतिष्ठा प्राप्ति के लिए लडे । वे मोहिनी, सुरा और अमृत पर ही मुग्ध ये । बिन्तु विष से डरनेवालों कँ पास मोहिनी सुरा और अमृत कब रह . सकै ।

धन्वन्तरि धन्च का बेटा था । समुद्र का बेटा उसे इतिहास और पुराण कोई नहीँ कहता । समुद्र में से आविर्मूत धन्वन्तरि पहले कहौं थे ? पीछे काशी में ही कैसे पहुंच गए ? इसका उल्लेख न पुराण में है न इतिहास में । समुद्र की घटना एक राजनैतिक सघर्ष का निर्देश मात्र हे । उसे देश और काल के अनुसंधान के अनंतर ही संघटित किया जा सकेगा ।

क्यऱ मथा जानेवाला समुद्र भूमध्यसागर था ? ‘त्रिपुरारी’ विरुद यह इंगित करता है कि यह घटना भूमध्य सागर मेंहुई होगीं । क्योंकि त्रिपुर (१४९1३०1९) वहीँ हे और असुर लोक भी वहीँ ।

सुमेरु क्रो मथनी बनाकर समुद्र को मटूठे की भाँति मथना बुद्धिगम्य नहीं । वेसा हुआ भी नहीं होगा । मंथन शब्द राजनैतिक भाव में अनेक व्यक्तियों द्वारा किसी प्रश्न पर गहन विचार-विमर्श को घोषित करता है । आज न्यूयार्क में भारत और पाकिस्तान के मध्य राष्ठट्रीय सीमाओं का मंथन चल रहा है । उस युग में क्षीर-समुद्र के प्रश्न पर मंथन चला होगा और वह सुमेरु पर्बत (थिवानशान) के किसी प्रदेश में बैठकर किया गया । यही सारी कथा का तात्पर्य होना चाहिए ।

प्रतीत होता है असुरों ने अमृतपान में अधिकार की माँग की । धन्वन्तरि अमृत देने की उदारता तक झुके । क्योकि वह विज्ञान एकमात्र उन्हीं के अधिकार में था । मंथन में अन्य जिऩ वस्तुओं का बँटवारा हुआ उनमें पहला बिष ही प्रस्तुत था । असुर विष पीने को तैयार न हुए । वह नीलकंठ शंकर ने पी लिया । र्कितु बँटवारा भंग हो गया । जब विष एकतरफा पीना पड़ा तो अमृत भी एकतरफा ही बटना आवश्यक हो गया ।

इस न्याय के बिल्ड धृष्टता करनेवाले राहु और केतु की गर्दनें कट गई । भगवान विष्णु का चक्र आत्ततायियों कै बिल्ड घन गर्जन कर उठा । यहीँ देवासुर संग्राम का आधार था ।

धन्वन्तरि भाग 8

इसके सपथ-साथ वेदार्घ की नियत परिपाटी के अनुसार, दिवोदास का अर्य सूर्य होता है । शम्बर मेघ का नाम है1 । उसका शत्रु सूर्य ही है । श्रुति, लिंग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या जेसे वेदिक व्यूह से जब शब्दार्थ खरा उत्तर सकै तब कहीँ अर्य निर्णय की स्थिति प्राप्त हो । वेद में “दिविदेवासो अग्निम्‘ जैसे उल्लेख बहुधा आए हैँ । पस्तु उनसे दिवोदास का इतिहास निर्णय करना धृष्टता मात्र होगा ।

पुराणों में भी कतिपय दिवोदासों का उल्लेख है । परलु यहीं तो काशिराज दिवोदास की ही चर्चा करनी है । हरिवंश पुराण के 29वें अध्याय में काश नामक राजा के वंश का वर्णन मिलता है । महाराज काश के ही वंश में धन्वन्तरि का जन्म हुआ था । दिवोदास भी

इसी वंश के एक पुरुषरत्न थे । उक्तपुराण में काशी के राजवंश की परंपरा इस प्रकार दी गई है

1हुँ काश 2. दीर्घतपा:

  1. धन्व 4. धन्वन्तरि
  2. कंतुमान 6. भीम रथ (भीमसेन) 7. दिवोदास 8. प्रतर्दन
  3. वत्स 10. अलर्क

काशी के राजवंश में इनके अतिरिक्त और भी क्रित्तने ही प्रतापी तथा विद्वान सम्राट हुए परंतु यहाँ तो हमें धन्वन्तरि के जीवन पर ही विचार करना है ।

यह सब वंशक्वेंपरंपरां रहते हुए भी पुराणों में समुद्र मंथन और उससे धन्वन्तरि का आविर्भाव होने की कथा का क्या तात्पर्य है? यह समुद्र कौन था? उसका मंथन क्या ? और उसके द्धारा धन्वन्तरि का अमृत कलश लिए आविर्भाव क्यश्वा? यह सारी अत्यंत हुंहत्त्वमूर्ण राजनैतिक समस्याएँ हैँ जिनको गहराई में जाकर समझने की आवश्यक्ता

1 ,

वह युग था जब एशिया में दो ही राष्ट्र प्रबल थे । पहले देव ये, जिनमें भारत या स्वर्ग के पंचजन संगठित थे । दूसरे असुर, जिनका शासन केंद्र असुर लोक (एसीरिया) था । यद्यपि अभिजन की दृष्टि से दोनों ही आर्य जाति के मूल पुरुषों की संतान थे 3 किंतु दोनों कै मिन्न८भिन्न दृष्टिकोण ने भिन्ग-भिन्ग दो राजनैतिक राष्ट्ररें की स्थापना की । दोनों में रिश्तेदारिर्यों हुईं । घनिष्ठ मित्रताएँ हुई और घनघोर युद्ध भी हुए । असुरों का भोतिक्वादृ और देवीं का अध्यात्मवाद ही उनके मूल अंतर थे । स्वाभाविक ही भौतिकवादी

अघिकार के लिए मरता है और अध्यात्मवादी वल्लंय्य के लिए । देवों और असुरों के संघर्ष समयक्वेसमय पर इसी प्रेरणा के आधार पर हुए । अधिकार में जीवन की ममता होती

है और कर्तव्य में बलिदान की भावना । यहीँ कारण है कि अनेक वैज्ञानिक प्रवृत्तियों में देवों से ‘बढे-चढे रहने पर भी असुर पराजित हुए ।

वह देवासुर संग्राम धन्वन्तरि के युग की घटना है जिसमें अमृत कलश लेकर धन्वन्तरि के प्रकट होने की कथा है । उस समय कं समुद्र मंथन से चंद्रमा, लदनी, सुरा, उच्चेश्रवा (घोडा), ऐरावत (हाथी), कौस्तुभ मणि, कामधेनु, क्लावृक्ष, अप्सराएँ और विष प्रकाश में आए । महाभारत तथा श्रीमदूभागवत् पुराण में यह उपाख्यान विस्तार से दिए गए हैं ।1 समुद्र मंथन के कार्य में देव और असुर दोनों जुटे । इस मंथन में पहले-पहल हलाहल (बिष) ही निकल पड़ा । असुर देवताओं के साथ आधा बिष पीने को तैयार न हुए । र्कितु भारतीय राष्ट्र में शंकर जैसे महापुरुष विद्यमान थे जिन्होंने सारा ही बिष पी लिया और असुरों क्री इस भय से मुक्त कर दिया । असुर यह नहीं समझ सके, जो विष पीकर नहीं मरता अमृत उसका ही अनुगामी होता है ।

समुद्र, लदमी और अमृत पर एकाधिपत्य पाने के लिए असुरों ने भारतीय देयों से युद्ध ठान तिया । परंतु जो राष्ट्र जहर पीकर नहीं मरा उसे मृत्यु कब डरा सकी? इतिहास को अभी यह निश्चय करना है कि यह युद्धम्पूमि त्रिपुर (’1३च्चानु;)०1६, च्छावृदृ) थी या पुष्कलावती (चारसदूदा) या दोनों? भारतीय सेनापति का विरुद ‘त्रिपुरारी’ यह सूचित करता है कि वह युद्ध भूमि “त्रिपुर” यी 3 जिसमेँ त्रिपुरारी शंकर योद्धा थे और ब्रह्मदेव सारथि । और वह समुद्र भूमध्य सागर, जिसका मंथन हुआ होगा । मनुस्मृति में भारतीय सीमाओँ में “आससुद्राचूवे पूर्वादाससुद्रातु पश्चिमामृ’ की परिभाषा तभी संघटित हो सकेगी । आखिर लदमी और अमृत दोनों भारतीय देवों ने जीत लिए । भगवान धन्वन्तरि का वह अमृत मस शुभ्र कलश देवों ने ही पीया । वे अमर हो गए और असुर मरण-धर्मा ।

इतिहास बिष पीनेवालों की अमरता से भरा है । दौलत पाका अमरता चाहनेवालों की मौत इतिहास के एक-एक पृष्ठ के पीछे से झाँकैती हुई दिखाईं देती हे । धन्वन्तरि उन लोगों में से थे जो औरों के लिए अमृत लेकर आए और स्वयं विष पीकर अमर हो गए । उत अमर देवता के नाम से भारत के एक-एक घर में आहुति दी जाती हे । यही उसका अमरत्व है ।

सुश्रुत सहिता में भी धन्वन्तरि को अमृत का उदूभव (जनक) लिखा हे 3 हमने अश्विनी कुमारों कै चरित्र-चित्रण में अमृत के आविष्कार का उल्लेख किया हे । स्वर्ग की सीमा में सामाजिक-संगठन और सम्मान का यह प्रतीक था । किंतु धन्वन्तरि जैसे

८…५

धन्वन्तरि भाग 7

तीन महापुरुषों के वैज्ञानिक जीवन का मूर्त्त रूप है । आज भले ही आयुर्वेद शल्यविज्ञान में शिथिल प्रतीत होता है, किंतु इतिहास साक्षी हे कि आयुर्वेद का वह विज्ञान प्राचीन काल में पराकाष्ठा तक पहुंचा हुआ था । पूषा के दाँत, इंद्र की भुजाएँ और यज्ञ के ब्रह्मा का कटा हुआ सिर जोडने वाले अश्विनी कुमार धन्वन्तरि से बहुत पूर्व स्वर्ग में ही विद्यमान थे । वह बिज्ञान धन्वन्तरि जैसे प्रतिभाशाली महापुरुष की बुद्धि से विकसित होकर कई गुना समृद्ध हो गया था । ब्रह्मर्षियों ने विशेषकर काय चिकित्सा आदि छड अंगों में अपूर्व आविष्कार किए, र्कितु राजर्षियों ने शल्य और शालाक्य में वैज्ञानिक संसार को चकित कर दिया । काशी का धन्वन्तरि और मिथिला का वेदेह संप्रदाय इस बिज्ञान में सर्वाधिक अग्रणी रहा हे ।1

दिवोदास, मरीचि, कश्यप ‘और आत्रेय-पुनर्वसु प्राय: समकालीन थे । परंतु धन्वन्तरि इन सब से तीन पीढी पूर्व । उपर्युक्त तीनों महर्षियों ने धन्वन्तरि के सिद्धांत अपने-अपने ग्रंथों में उद्धृत किए हैं । यद्यपि दिवोदास ने धन्वन्तरि का नाम स्वाहाक्रार वो साथ नहीं लिखा, परंतु कश्यप और आत्रेय ने उसे स्वाहाकार के साथ ही लिखा है । यह उचित ही था । यदि दिवोदास अपने प्रपितामह के लिए स्वाहाकार लिखते तो अपने मुँह मियाँ मिटूदूवाती कहावत चरितार्थ हो जाती । ब्रहार्षियों के मुख से स्वाहाकार सुनकर संसार पन्वन्तरि कै अगाध गौरव का सही अनुमान लगा सकता हैँ ।

यह ध्यान रखने की बात है कि प्राचीन महांर्वेयों ने शल्य शास्त्र के उद्धरण प्राय: धन्वन्तरि कं नाम से ही प्रस्तुत किए हैँ, दिवोदास के नाम से नहीँ । यद्यपि सुश्रुत संहिता को मूर्तरूप में लाने का श्रेय महाराज दिवोदास क्रो ही है । इसका मुख्य कारण यहीँ है कि दिवोदास ने धन्वन्तरि के मिशन के साथ अपने व्यक्तित्व की इतना तदूप कर दिया कि संसार ने उन्हें भी धन्वन्तरि दो रूप में देखा और धन्वन्तरि कहकर ले संबोधित किया । इससे बढकर सुपूती अनैर क्या होगी कि सिंहासन पर शासन सूत्र सथ में लिए हुए उन्होंने अपने पूर्वजों के यश को दिगंत में विस्तीर्ण किया और शासन से

उपरक्त ढोकर आश्रम में वास करते हुए भी उन्हीं वंदनीय पूर्वजों के ज्ञान ओर विज्ञान कै गौरव क्रो अमरता प्रदान की 3 क्यक्च यह कहने में अतिशयोक्ति होगी कि भगवान

धन्वन्तरि के समग्र जीवन का संचित पुण्य ही मानो मूर्त होकर दिवोदास के रूप में अवतीर्ण हुआ था? धन्वन्तरि वह ज्योति ये जिसके उदय क्रो देखकर अस्ताचल या विलीन हो गया ।

सुश्रुत ने अपने गुरु महाराज दिवोदास को सदैव धन्वन्तरि वो रूप में ही देखा । मानो धन्वन्तरि ही दिवोदास में बोलते रहे हों 3 धन्वन्तरि की चार पीढी बाद आचार्य दिवोदास के उपदेश सुनकर सुश्रुत ने यहीँ कहा, “यथीवाच भगवान धन्वन्तरि८ ।’ जेसा धन्वन्तरि ने कहा था ठीक वेसा ही यह उपदेश है । उन्होंने अग्निवेश के ‘इतिहस्माह भगवानान्नेया की भाँति ‘इतिहस्माह भगवान दिवोदास८’ नहीं लिखा । क्योंकि जो कुछ कहा गया था वह मानो दिवोदास का नहीं धन्वन्तरि का ही था । सुश्रुत ने नहीं, स्वयं राजर्षि दिवोदास ने उसी भाव क्रो सुदर शब्दों में कहा, ‘मुझे आदिदेव धन्वन्तरि ही समझ लो क्योंकि मैंने उन्हीं की ज्ञान राशि का वितरण करने फे लिए वसुधा पर जन्म लिया है 3 गुरु के चरणों में यह श्रद्धापूर्ण “ब्रह्यार्पण’ है । जिसमें भक्ति पूरित हृदय अपने अस्तित्व को भूल जाता है । लोकमान्य तिलक द्वारा उद्धृत संत तुकाराम का यह अभंग मानो इसी भावना का सजीव चित्रण है…

“संतों क्री उच्छिष्ट उक्ति है मेरी बानी । जानूँ उसका भेद भला वया मैँ अज्ञानी? । ।”

प्रत्येक पुत्र को अपने पूर्वजों की, और प्रत्येक शिष्य क्रो अपने गुरुओं क्री प्रशस्ति प्रतिष्ठित करने का यह भारतीय आदर्श है । सत्य यह हे कि शल्य शास्त्र को आत्मा भगवान धन्वन्तरिं अवश्य हैँ, र्कितु उससे बडा सत्य यह है फि उस आत्म-साक्षात्कार के लिए दिवोदास की साधना ही अनिवार्य है ।

ऐतिहासिकों की सम्मति में ऋग्वेद के प्रथम मंडल तथा कईं अन्य स्थलों में दिवोदास नाम के किसी राजा का उल्लेख है ।3 परंतु उस दिवोदास की वीरता कै वर्णन में “अतिथिग्वामु “शम्बर शत्रु८’, “सुदास पिता’ आदि विशेषणों का उल्लेख हे । काठक संहिता के मंत्र भाग में भी एक ‘ब्रघ्नश्व दिवोदास’ का उल्लेख है र्कितु इस दिवोदास का काशिराज हीना तथा धन्वन्तरि का प्रपौत्र होना किसी प्रकार सिद्ध नहीं । ना ही

उसका प्राणाचार्य होना प्रमाणित है । इसलिए ऋग्वेद दो दिवोदास क्रो काशी में लाना और प्राणाचार्य घोषित करना अत्यंत दुस्सगहस का काम है ।

धन्वन्तरि भाग 6

तदघीतेतडेर्दी, “प्रोक्तग्रल्लुक’, ‘छंदोब्रह्मणानि च तद्विषवाणि’ -अग्रदि सूत्रों द्वारा आचार्य पाणिनि ने भारतीय शिक्षा पद्धति की एक विस्तृत परंपरा का उल्लेख किया हे । इसमें संपूर्ण वेद और वेदांगों की शाखाएँ और चरण समाविष्ट है । जिस प्रकार कठ और कलाप शाखाएँ विस्तृत थीं उसी प्रकार आयुर्वेद में भी धान्वन्तर, आत्रेय ओर काश्यप शाखाएँ चल गई थीं । उन्हीं कं पूर्ववर्ती आचार्यों की ब्राह्म, ऐन्द्र और आश्विन शाखाएँ स्वर्ग के साम्राज्य में पहले से प्रचलित थीं । अध्ययन करने के अभिलाषी वहाँ जाते और ज्ञान प्राप्त करते ये । दूरन्दूर जाकर ज्ञानार्जन करनेवाले इन जिज्ञासुओं को ही ‘चरक‘ कहा जाता था । “कठ चरकाल्लुकुं’ सूत्र में उन्हीं का उल्लेख हे ।

ऐसे अध्येता ब्रह्मचर्य विधि से समित्पाणि हो गुरु के पास अध्ययन की नियत ” अवधि तक ज्ञानार्जन करते थे 3 वह युग था जब धन्वन्तरि, अत्रि, भृगु, भरद्वाज आदि चरक-वृत्ति जिज्ञासु इंद्र के विद्यालय में ज्ञानार्जन के लिए जाते और नियत समय में बिशेष योग्यता संपादन कर कर्मक्षेत्र में प्रवृत्त होते । इंद्र और भरद्वाज से धन्वन्तरि का ज्ञानार्जन उसी बिशेष योग्यता का निर्देश करता हे जिसे उन्होंने इंद्र से भी प्राप्त किया और भरद्वाज से भी ।

शिक्षा शेली में माणवक, अंत्तेवासी, चरक और पारिषद्य के उपरांत मूयोविद्य क्री पदवी तक पहुँचना उसका आदर्श था । माणवक प्रारंभिक शिक्षा, अंतेवाप्ती माध्यमिक शिक्षा, चरक उच्चशिक्षा और पारिषद्य शिक्षाधिकारी होते थे । जो अनेक विद्वानों की परिषद में बैठकर उनके प्रश्नों का उत्तर दे सकै और सिद्धांत पक्ष का समर्थन का सके । इस प्रकार की कितनी ही परिषदों का उल्लेख आयुर्वेद संहिताओं में वर्णित है । इन परिषदों में मूयोविद्य वे थे जो सारे वरद-विवाद पर अपनी अंतिम व्यवस्था देने योग्य माने जाते हैं । जिनके निर्णय ही सिद्धांत बन गए । सुश्रुत सौहेता में औषधेनव, वेतरण एवं सुश्रुत आदि के प्रश्नों पर धन्वन्तरि के विचार ही सिद्धांत बन गए हैं ।3 चरक संहिता में भी ऐसे अनेक प्रसंगों का उल्लेख है ।4 आत्रेय भद्रकाप्पीय अध्याय ऐसे ही प्रसंग का उल्लेख है । यज्ज: पुरुषीयाथ्याय एक ऐसी ही परिषद का चित्रण हैँ जिसकै णस्पिय भगवान आत्रेय पुनर्वसु ही ये ।

गवेषणाएँ की थीं, उनके प्रपौत्र दिवोदास ने उन्हें और परिमार्जित का सुश्रुत आदि शिष्यों को उपदेश किया । सुश्रुत संहिता का प्रथम अध्याय इस बात को भली भाँति स्पष्ट काटा है । ग्रंथ प्रारंभ करते हुए ही इस भाव को प्रस्तुत किया गया है । ‘यथोवाच मक्यान् धन्वन्तरिद्र’ किंतु इसमें सदेह नहीं कि दिवोदास की योग्यता भी चोटी तक पहुंची इसीलिए उनके सम्मान के लिए उनके प्रपितामह का नाम ही उनकी उपाधि बन नत्या–दिवोदास धन्वन्तरि’ । फलता दिवोदास का शल्य शास्वीय उपदेश भगवान धन्वन्तरि की विरासत

ही हे ।

धन्वन्तरि केवल मानवीय आयुर्विज्ञान कं पारंगामी ही नहीं थे, वोड़ा, हाथी तथा वृक्षों की चिकित्सा में भी अपूर्व योग्यता रखते थे । प्रपितामह का वह बिज्ञान दिवोदास के पास भी या । अग्निपुराण में लिखा हे कि धन्वन्तरि ने वे संपूर्ण विज्ञान अपने शिष्यों को उपदेश किए थे ।1 चूँकि शिष्यों का आग्रह शल्य प्रधान उपदेश कं लिए था इसलिए सुश्रुत संहिता में वही बिषय मुख्य रूप से प्रतिपादित किया गया 3

हाथियों का आयुर्विज्ञान पालकाप्य शास्त्र में घोडों का शालिहोत्र शास्त्र में पेड़-पौधों का वृक्षायुवेंद शास्त्र मेँ3 तथा पक्षियों का शकुनि-विज्ञान-शास्त्र में, विस्तृत स्म से पल्लवित करनेवाले’ आचार्य धन्वन्तरिं के युग से पूर्व और पश्चात तक होते रहे हैँ । इन सभी शाखों के उद्धरण तथा प्रसंग-वर्णन हमें आयुर्वेद ग्रंथों में जहाँ-तहौं मिलते हैं । हृ’द्गी के स्वनामधन्य सम्राट हम्मीरर्सिंह चौहान के प्रधानमत्री के पौत्र भी शाङ्गधिर द्वारा संपादित शाङ्गदृधर पद्धति एक बड़ा उपयोगी संग्रह ग्रंथ है । इसमें उक्त विषयों पर उपादेय संकलन प्रस्तुत किए गए हैं । र्कितु यहॉ हम आयुर्वेद वो जिस अंश का प्रतिपादन करने चले हैं उसमें इन विषयों का विवेचन प्रासंगिक न होगा ।

महाराज दिवोदास से पूर्व भगवान धन्वन्तरि अथवा उनके किसी शिष्य ने कोई ग्रंय लिखा था या नहीं, यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता । क्योंकि वैसा कोई ग्रंथ अब उपलब्ध नहीं । फिर भी प्राचीन उल्लेखों के आधार पर प्रतीत होता है कि ‘धन्वन्तरि-संहिंत्ता’ नामक कोई ग्रंथ अवश्य था । प्राचीन ग्रंथों में “धन्वन्तरीयघृत’ एवं “धान्वतर मत’ जैसे उल्लेख प्राप्त होते हैँ । यह उसी संहिता का निर्देश देते प्रतीत होते हैं । परंतु आज धन्वन्तरि के बिज्ञान वेभव की बानगी महाराज देवोदास के उपदेशों में ही देखी जा सकती हे ।

सुश्रुत संहिता एक व्यक्ति का’ नहीँ, बल्कि धन्चन्तरि; दिवोदास और सुश्रुत इन

इस प्रकार हम यह जानते हैँ कि भगवान धन्वन्तरि उन महापुरुषों में से ये जिन” चूव्यवस्थाएँ परिषदों में सिद्धांत बन गई । धन्वन्तरि ने शल्य शास्त्र पर जो महत्त्वपूर्ण