धन्वन्तरि भाग 15

अलर्क कै वाद वाराणसी चमकी । इसलिए ज्यों-ज्यों वाराणसी का यश बढता गया, साहित्य में उसकी गरिमा बढती गई । बौद्धकाल (ई. पू. 600) में काशी शब्द मंद पड़ गया, वाराणसी ही प्रतिष्ठित थी । विनय पिटक में आठ दस बार वाराणसी का उल्लेख हे । महावग्ग सें भगवान गौतमबुद्ध की धर्म चक्र प्रघर्त्तना का […]

धन्वन्तरि भाग 14

एक चतुर्युगीम्भ32000० वर्ष (तेतालीस लाख बीस हजार) यह सातवाँ वैवस्वत मन्तंतर व्यतीत हो रहा है । उसमें यह अटूठाइसर्वी चतुर्युगी चल रही है । वइतिनुम है, जिसके अब तक 5021 वर्ष व्यतीत हो चुकें हैं । 426979 वर्ष अमी और कलियुग ही चलेगा 1 परंतु इस काल-गणना में धन्तन्तरि अथवा दिवोदास को उचित स्थान पर […]

धन्वन्तरि भाग 13

दृढ प्रकार स्वर्ग भ्रष्ट देखकर प्रतर्दन ने कहा, “हे पुरुष श्रेष्ठ र में अपने समग्र पुण्य देकर आपकी फिर स्वर्ग पहुंचाना चाहता हूँ । बताइए मेरे पुण्य से कितने लोक उपार्जित हैं? क्याति ने उत्तर दिया, “प्रतर्दन १ तुम्हारे पुण्य से इतने लोक विजित हैं, यदि तुम उनमें प्तात-सात दिन ही रहो, तो उनका अंत […]

धन्वन्तरि भाग 12

उसे तक्षशिला जाना पड़ा । जो भी हो, ब्रह्मदत्त अपने पूर्वज स्वनामधन्य धन्वन्तरि की आयुर्वेद परंपरा को इस समय भी अक्षुण्य रखे हुए थे । घन्वन्तरि को वीरता और बिद्धत्ता दोनों ने प्रतिस्पर्धा के साथ संपूजित किया । वे बिष्णु के अवतार थे, इसलिए लश्मी तो उनकी चिरसंगिनी धी ही । वीरता ने उन्हें रुद्र […]

धन्वन्तरि भाग 11

भागवत में लिखा है कि धन्वन्तरि के वंश में अनेक पीढियों कै उपरांत गंभीर टाम का सम्राट हुआ । गंभीर का मुत्र अक्रिय था । र्कितु अक्रिय की संतानें क्षत्रिय नहीं रहीं, वे ब्राह्मण हो गई ।1 इस प्रकार इस वंश की राजकीय प्रभुसत्ता क्षीण ही गई । हरिवंश पुराण में समुद्र मंधन का उल्लेख […]

धन्वन्तरि भाग 10

देवों ओर असुरों के बीच क्षीरसागर के प्रश्न पर होनेवाले मंथन का यहीँ अभिप्राय है । धन्वन्तरि ही इस मंथन के अधिष्ठाता थे । राष्ट्र जीवन के बँटवारे में आने वाले सारे तत्त्व इतिहास कै पृष्ठों में अमर हो गए, क्योंकि धन्वन्तरि का अमृत उनकें साथ था । भले ही धन्वन्तरि का अमृत मर गया, […]

धन्वन्तरि भाग 9

महापुरुषों ने स्वर्ग और नरक का भेद ही समाप्त कर दिया था । विशाल आर्यावर्त का साम्राज्य बन चुका था । जिसमें स्वर्ग और नरक का विलय हो गया था । सारे आर्यावर्त का गणनायक अब भी इंद्र ही था । क्रितु शर्त यह थी कि जिसने सौ यज्ञ पूर्ण कर लिए हों हो वही […]

धन्वन्तरि भाग 8

इसके सपथ-साथ वेदार्घ की नियत परिपाटी के अनुसार, दिवोदास का अर्य सूर्य होता है । शम्बर मेघ का नाम है1 । उसका शत्रु सूर्य ही है । श्रुति, लिंग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या जेसे वेदिक व्यूह से जब शब्दार्थ खरा उत्तर सकै तब कहीँ अर्य निर्णय की स्थिति प्राप्त हो । वेद में “दिविदेवासो […]

धन्वन्तरि भाग 7

तीन महापुरुषों के वैज्ञानिक जीवन का मूर्त्त रूप है । आज भले ही आयुर्वेद शल्यविज्ञान में शिथिल प्रतीत होता है, किंतु इतिहास साक्षी हे कि आयुर्वेद का वह विज्ञान प्राचीन काल में पराकाष्ठा तक पहुंचा हुआ था । पूषा के दाँत, इंद्र की भुजाएँ और यज्ञ के ब्रह्मा का कटा हुआ सिर जोडने वाले अश्विनी […]

धन्वन्तरि भाग 6

तदघीतेतडेर्दी, “प्रोक्तग्रल्लुक’, ‘छंदोब्रह्मणानि च तद्विषवाणि’ -अग्रदि सूत्रों द्वारा आचार्य पाणिनि ने भारतीय शिक्षा पद्धति की एक विस्तृत परंपरा का उल्लेख किया हे । इसमें संपूर्ण वेद और वेदांगों की शाखाएँ और चरण समाविष्ट है । जिस प्रकार कठ और कलाप शाखाएँ विस्तृत थीं उसी प्रकार आयुर्वेद में भी धान्वन्तर, आत्रेय ओर काश्यप शाखाएँ चल गई […]