धन्वन्तरि भाग 5

इस प्रकार यह स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं कि जैकोबी और मेकडानल जैसे इतिहासज्ञों के अनुसार इतिहास के आधुनिकतम प्रमाणों के आधार पर ईसा से 3००० से 4500 वर्ष पूर्व भूमध्य सागर (धन्व) तक भारतीयों का ही राजनैतिक तथा सांस्कृतिक अनुशासन स्थापित था । पश्चिम की ओर बढते हुए असुरों तथा पूर्व कॅ देवीं ने जिस युग में राजनैतिक एवं सांस्कृतिक आंदोलनों द्वारा यह सागर मंथन किया उसी युग में घन्दन्तरि का आविर्भाव हमारे विशाल रांष्ट्र के लिए एक वरदान सिद्ध हुआ । छांदोग्य उपनिषद ने लिखा हे कि वस्तुत: देवता और असुर एक ही वंश की संतान थे । विचारों के भेद ने दोनों दलों में भारी भेद उत्पन्न कर दिया । देवता आस्तिक थे और असुर नास्तिक । देव आत्मा में विश्वास करते थे और असुर भौतिक देह में ही । इसी विचार भेद ने विश्व का इतिहास बदल दिया । धन्वन्तरि ने लिखा कि वस्तुत: प्राण के मोह में असुर मारे गए और देवों ने आत्मा की अमरता में विश्यास रख कर प्राणों का मोह छोड दिया । वे राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों पर बलिदान होना जानते थे । ‘न जायते प्रियतेवा कदाचित्’ की भावना लेकर वे कर्मक्षेत्र में सदैव अग्रसर हुए । छोदोग्य ने असुरों की उपमा उस श्रमिक से दीं हे जो एक भारी चटूटान को उसी के नीचे बैठकर खोदता रहा । नीचे की मिटूटी खुद गई, र्कितु चटूटान उसी के सिर पर गिरी ओर वह सदा कै लिए सो गया ।1 सचमुच विश्च के इतिहास में असुर इसी प्रकार सो गए र द्रिन्तु देवों की सत्ता असुष्ण बनी रही । धन्वन्तरि उसी परंपरा के कर्णधारों में से ये । कांकायन बाल्होक भिषक पोष्कलावत षुष्यल्लावती (चारसदूदा) के निवासी, औरप्र ठा (बेबीलोन) के निवासी तथा पारसी धर्मं-ग्रंथ आवेस्ता में दिवोदास, सुश्रुत एवं करदीर्य फावीर पुर द्रुपद्धती या आपू (दरिया के तट पर) निवासी तथा पारसी धर्मग्रंथ आवेस्ता में दिवोदास, सुश्रुत एवं करबीर्य आदि-नामों की प्रतिच्छाया क्या यह स्पष्ट नहीं करती कि श्चन्तरि का विरुद भूमध्य कैरेगिस्तानों को पार कर गया था र आयेस्ता के ‘दिदेबोदात‘ तथा

डी’सोरुग्यर’ में स्पष्ट ठी दिवोदास और उनके शिष्य सुश्रुत की नाम साम्यता प्रतिध्वनित ही है .2

हरिवंश पुराण में महर्षि भारद्वाज से भी धन्वन्तरि कां विद्या ग्रहण करने का उल्लेख हे ।1 उसी प्रकार आयुर्वेद को अष्टणि विभाग काने का श्रेय कुछ प्राचीन ग्रंधकारों ने भारद्वाज को और कुछ ने धन्वन्तरि को दिया हे । र्कितु सुश्रुत सहिता का कथन यह हे कि स्वयं ब्रह्मदेव ने ही आयुर्वेद को आठ अंगों में विभक्त कर दिया था । वे आठ अंग ये हैं..

  1. शल्य, 2. शालाक्य, 3. कायविक्रित्सा, 4. भूतविद्या, 5. कोमार मृत्य, 6. अभद्र तंत्र, 7. रसायन तंत्र, 8. वाजीकरण तंत्र 3

धन्वन्तरि तथा अन्य महर्षियों ने इन आठ अंगों का विस्तार किया है । सुश्रुत संहिता का प्रारंभिक गुरुसूत्र भी यही बतलाता डै कि शल्य, शालाक्य आदि आयुर्वेद के आठों अंग पृथक-पृथक पहले से थे ही, धन्वन्तरि ने उन्हें और विस्तृत किया है 3 इसमें संदेह नहीँ क्रि धन्वन्तरिं के आयुर्वेद विज्ञान की इतनी धाक थी कि देव लोग भी उनकी चिकित्सा का आदर करते ये । स्वर्ग कै देवताओं को आरोग्य और दीर्घ जीवन प्रदान करने की विद्या अब नरक कं सम्राट धन्वन्तरि कै पास थी । इसीलिए वह देवताओं में भी संपूजित ‘आदिदेव’ हुए । “जरा रन्जा मृत्यु हरोमराणान्’ का यहीँ स्वारस्य है । पौराणिकों की यह कल्पना मिथ्या नहीं है कि अमृत का वल्लश अब धन्वन्तरि कैहायमेंथग्रा

धन्वन्तरि के विद्याग्रहण और अष्टग्रेग विभाग करने कँ संबंध में भिन्त-भिन्न उल्लेख परस्पर विरोधी नहीँ है । वास्तविकता यह हे किं धन्वन्तरि ने इंद्र से भी पढा और भरद्वाज से भी । आत्रेय ने भी प्रथम भरद्वाज से ज्ञान प्राप्त किया और तदनंतर रसायन विज्ञान अध्ययन करने के लिए हिमालय के सम्राट इंद्र के विद्यालय में नंदन वन भी गए । एक ही व्यक्ति अनेक विषयों का उतना विशेषज्ञ नहीं होता जितनी योग्यता भिन्नक्वेमिन्न विशेषज्ञों क्रो । अपनेन्तापने विषयों के विशेषज्ञ विद्वानों द्वारा ज्ञान प्राप्त करने की परिपाटी भारत के विद्वानों में प्राचीन काल से रही है ।

धन्वन्तरि भाग 4

  1. देवताओं और असुरों ने समझौते से बँटवारा किया जिसमें चंद्र, लस्सी, सुरा, दृच्चे८श्रवा, कौस्तुभमणि आदि देवताओं को मिले । असुर आग्रहशील थे कि अमृत उन्हें दिया जाए अथवा अमृत बनाने और उसका व्यवसाय करने का अधिकार एकमात्र उन्हें मिले । निर्णय हो गया । पंचायत से भले ही अमृत का अधिकार असुरों क्रो मिला विन्तु बिष्णु और धन्वन्तरि ने मिलकर अमृत का व्यवसाय देवताओं के पक्ष में फिर चालू कर दिया क्योंकि धन्वन्तरि अमृत का प्रयोग और निर्माण स्वयं जानते ये । सुश्रुत ने इस प्रयोग को अपने गुरु दिवोदास से पाकर सुश्रुत सहिता में उसका उल्लेख भी किया हे 3 वह धन्वन्तरि क्री विरासत ही यी ।
  2. देवताओं और असुरों का संग्राम राजनेतिक और आर्थिक प्रभुता के लिए हो हुआ था और वह प्रभुता देवताओं को धन्वन्तरि के सहयोग से ही मिली । धन्व वे मरुस्थल ही थे जो आज भी काश्यपीयसर (कास्पियन सागर) के चोगिर्द नमक के रेगिस्तान कहे जाते हैँ तथा असुर लोक (अप्तीरिया) के किनक्तिक्लिरि असीरियान्धाम के रेगिस्तान कं नाम से प्रसिद्ध हैँ । रघुवंश में महाकवि कालिदास द्वारा लिखा गया रघु का पारस्य विजय उसी ओर का निर्देश करता है 3 काश्यपीयसर उन्हों महापुरुषों की बिजयों का प्रतीक है । ‘पूर्वीय प्रशांत महासागर के तट से चलकर भूमध्य सागर तकठआर्यावर्त्त है’ मनु का यह लेख उसी ऐतिहासिक सत्य कं समर्थन में लिखा गया था ।

पूर्व में प्रशांत महासागर में टांविग्ग तथा स्याम की खाडी से लेकर पश्चिम में फारस की खाडी, कास्पियन सागर एवं भूमध्य सागरपर्यन्त जो विशाल समुद्र मंथन हो रहा था उसका केंद्र उन दिनों कै उत्तर कुरु (सिंफियांग) में स्थित सुमेरु अथवा मंदराचल (पामीर और थियान् शान्) पर्वत ही था 3 हमने अवतरणिका में लिखा है कि वीनीथाषा में थियान् शानू का अर्थ देवताओं का पर्वत ही होता है । इस संपूर्ण राजनेतिक आंदोलन के सूत्रधार धन्वन्तरि ही ये । अन्यथा प्रत्येक परिवार में अपने नाम से प्रतिदिन . एक आहुति पा लेना साधारण काम नहीं था ।

धन्वन्तरि का यह असाधारण विशेषण उनके वंश का विरुद बन क्या । धन्चन्तरिं” फै पुत्र फेतुमान हुए, र्कतुमान के भीमरथ ओर भीमरथ के दिवोदास । विन्तु दिवोदास

धन्वन्तरि कहकर ही सम्मानित किया रमया-“दिवोदासं धन्वन्तरिन् ।’ मूल धन्वन्तरि के भी कुछ शिष्य रहे होंगे, किंतु उनका परिचय नहीँ मिलता । ‘धन्वन्तरिसंहिता” नामक कोई ग्रंथ भी था, इसका आभास मात्र शेष है । स्वयं सुश्रुत सोंहेता में “ऐसा धन्वन्तरि का मत्त है ।’ इस प्रकार लिखकर जो सिद्धांत लिखे गए वे संभवतद मूल धन्वन्तरि को ही प्रस्तुत करते हैं । सुश्रुत संहिता का ही एक उल्लेख यह उहुंबोधन देता है कि मूल धन्वन्तरि की लिखित एक धन्वन्तरि सहिता भी रही होगी ।

सुश्रुत ने चार सागरों का उल्लेख किया है 3 धन्वन्तरि के युग में जिन चार सागरों का सागर-मंथन हुआ होगा निश्चय ही वे1 ॰ प्रशांत महासागर (दक्षिणी चीन सागर), 2. गंगासागर (बंगाल की खाडी), 3. सिंधु सागर (हिंद महासागर) तथा 4. भूमध्य सागर (रूम सागर) रहे होंगे । उस युग का आर्यावर्त इन्हीं चारों समुद्रों से वेष्ठित था । दिवोदास का प्रताप ओर पांडित्य इसी सुदीर्घ प्रदेश में प्रकाशित रहा । सन् 1907 ईं. में एशिया माइनर मेँ प्राप्त होने वाले एक उल्लेख से यह ऐतिहासिक सत्य और अधिक स्पष्ट होता है जिसमें भारतीय देवताओं के नामों का आदरपूर्वक उल्लेख किया गया है । इन देवों में मित्र, वरुण, इंद्र और नासत्य (अश्विनी कुमार) आदि का विवरण प्राप्त होता है ।3

आयुर्वेद का वह प्रारंभिक नहीं, बल्कि विस्तार का युग था जिसका संचालन ३ धन्वन्तरि ने किया था । उन्हीं देवों के संस्मरण रूप हम धन्वन्तरि फे प्रयोगों में अनेक औषधियों कै नाम देखते हैं । -ऐन्दी, इंद्रवारुणी, देवदास, ब्रह्मसुवर्चता, सोमलता, नागबला ।

धन्वतरि भाग 3

सहसा राजसिंहासन से उठ खड़े हुए । बालाकि का हाथ पकढ़कर एक सोते हुए आदमी

कै पास जा खड़े हुए । सम्राट ने कहर

‘व्यापक ब्रह्म ज्ञानमय हे । ठीक है । यह पुरुष सो रहा है । क्यों नहीं देखता ? क्यों नहीं सुनता १ क्यों नहीं बोलता ? क्या इसमें ब्रह्म ओत-प्रोत नहीं है र’

बालाकि से उत्तर न आया । घबराहट रहे कारण उसका गर्व चूर हो गया । बोला, ‘सम्राटा में यह रहस्य नहीं जानता । तुम्हारा शिष्य होता दूँ । यह रहस्य तुम्ही खोलो।’ ”

‘ब्राह्मण यह उल्टी बात होगी कि एक ब्रह्मर्षि राजर्षि का शिष्य बने । किंतु ज्ञान का अहंकार छोडी । यह रहस्य मैं तुम्हें यों ही बताए देता हूँ 1’

सम्राट ने बालाकि क्रो वह रहस्य बता दिया । इस रहस्य के विवेचन में जीवविज्ञान का जो सुंदर विवेचन किया गया उसमें आयुर्वेद के मोलिक तत्त्व विद्यमान हैँ ।

उपनिषदों में राजर्षियों का यह ज्ञान कोष मी ‘ब्राह्मण’ कहकर ही सम्मानित किया गया है और यह प्रतिष्ठा राजर्षियों को ब्रह्मर्षियों ने ही प्रदान क्री हे । धन्वन्तरि इस प्रतिष्ठा को एक कदम और आगे ले गए-घरद्ग-घर में उनके नाम की एक आहुति धर्मशास्त्र का विधान बन गईं । ‘

धन्वन्तरि दिवोदास, जिनका चरित्र हम यहाँ लिख रहे हैं, का पुत्रं प्रतर्दन भी एक उच्चकोटि का ब्रह्मवेत्ता था । कौषीतकिं ब्राह्मण उपनिषद मेँ1 प्रतर्दन तथा इंद्र के एक संवाद का उल्लेख है । प्राणविद्या का यह सुंदर वैज्ञानिक विवेचन यह स्पष्ट करता है कि दिवोदासक्विधन्वन्तरि ने अपने पूर्वजों से ज्ञान और विज्ञान की जो विरासत प्राप्त की यी उसे और समृद्ध करके अपनी संतान को भी प्रदान की । इस प्रकार धन्वन्तरि भारत के इतिहास के उन महापुरुषों में हैँ जिन्हें भारत की संतान कभी भूल नहीं सकती । न केवल धन्वन्तरि, बल्कि काशी के राजवंश ने भारत के इतिहास को युगन्युग

तक आलोकित किया है ।

सुश्रुत संहिता ने धन्वन्तरि के आयुर्वेद अध्ययन की एक परंपरा दी हे । ब्रह्मा ने आयुर्विज्ञान का मौलिक आविष्कार किया । इसी आविष्कार को ब्रआ से प्रजापति दक्ष ने अध्ययन किया र प्रजापति दक्ष से अश्विनी कुमारों ने । अश्विनी कुमारों से इंद्र ने और इंद्र से घन्वन्तरि ने । धन्वन्तरि ने इस धरोहर को ओपथेनव, ओरभ्र, वेतरण’, पोष्कलावत, कावीर्य, गोपुररक्षित तथा सुश्रुत आदि सात शिष्यों को सोंप दिया 3 कुछ लोगों का विचार है कि गोपुर और रक्षित यह दी व्यक्ति हैं । तय शिष्यों की संख्या आठ हो जाएगी । किंतु सुश्रुत कै व्याख्या लेखक ज्जाण का कहना है कि शिष्य आठ ही नहीं बारह थे ।

कि…

संहिता का मूत पाठ “सुश्रुत-प्रमृतया’ इस प्रकार है । प्रभृति शब्द अन्य जिन शिष्यों फा निर्देश करता हे वे चार और थे’-निमि, कांकायन, गारर्य तथा गालब । इस प्रकार धन्वन्तरिं के बारह शिष्य हो गए । उल्हण ने व्याख्या प्रसंग में इन शिष्यों में भोज का नाम लिखा हे । इन भोज का परिचय तो ज्ञात नहीं, र्कितु संभव है उल्हण के समय तक कुछ ऐसे प्रमाण मिलते होंगे जिनसे धन्वन्तरि कै शिष्यों में भोज का भी समावेश हो सका 41 र्कितु यह भोज निश्चय ही अरेंज-प्रबंध के लेखक राजा भोज से बहुत प्राचीन रहे होंगे । पाली भाषा में लिखित अयोधर नामक बौद्ध जातक में धन्वन्तरि कैसाथ चेतरण तथा भोज का उल्लेख हे । वहॉ उन्हे उत्कृष्ट चिकित्सक कै रूप में ही स्मरण किया गया है ।

नेपाल के श्री हेमराज शर्मा, जिन्होंने भूगर्भ से प्राप्त काश्यप संहिता का संपादन किया है, ने लिखा है कि उनके पास ताड्रपत्र पर लिखित सुश्रुत सहिता की एक प्राचीन पुस्तक है जिसमें धन्वन्तरि के शिष्यों में सुश्रुत आदि के साथ मौज का नाम भी लिखा है तथा वेतरण का भी । इस प्रकार उल्हण ने ‘प्रवृति‘ शब्द के अंतर्गत जिन अन्य पॉच शिष्यों के नाम समाविष्ट कर दिए हैं वे निराधार नहीं हैं ।

पौराणिक पुरातत्त्व के अनुसार काश के पौत्र धन्व ने समुद्र मंथन के समय उत्पन्न (अज्ज) देवता की उपासना की । फल यह हुआ कि वह समुद्र का देवता ही धन्वन्तरि के रूप में धन्व का पुत्र बनकर उत्पन्न हो गया 3 महाभारत तथा अग्निपुराण में भी यही उल्लेख प्राप्त होता है ।3 कल्पना यह है कि धन्वन्तरि विष्णु के अवतार ये । अर्थात् अज्ज देवता भी विष्णु ही था, जिसके अवतार धन्दन्तरि हुए । पौराणिक उपाख्यानों में तथा महाभारत में, यह भी लिखा है कि धन्वन्तरि अमृत से भरे हुए क्तश को हाथ में उठाए हुए समुद्र से अवतीर्ण हो गए ।

उपर्युक्त आख्यायिकाओँ से निम्म अभिप्राय स्पष्ट होता है…

  1. देवासुर संग्राम धन्वन्तरि के समय हुआ था और धन्वन्तरि उस संघर्ष कै प्रमुख राजनीतिज्ञों में एक थे ।

धन्वतरि भाग 2

हजारों वर्षों से प्रत्येक भारतीय के लिए भगवान धन्वन्तरि का नाम आदर्श जीवन का एक प्रतीक बना हुआ हे । अब वह एक व्यक्ति का नाम ही नहीं रहा, बल्कि ऐसा सूत्र बन गया है जिसमें भारतीय व्यक्ति और समाज के आदर्श जीवन की व्याख्या समाई हुई हे । यह एक जीवित सत्य है कि हजारों वर्षों से यज्ञ-आहुति के रूप में हम भगवान धन्वन्तरि का ऋण चुकाते चले जा रहे हैं, और अनंत काल तक आगे भी चुकाते ही रहेंगे तो भी हम उनसे उऋण नहीं हो सकते ।

धन्वन्तरि नाम में “धन्व’ शब्द का अर्थ रेगिस्तान हे । इसलिए धन्वन्तरि का अर्थ हे वह व्यक्ति जिसका यश रेगिस्तान के पार पहुंचा हो । यह रेगिस्तान मध्य एशियावतीं करबला (ईराक) का मरुस्थल ही हो सकता है । यह वाल्होक (वेबीलोनिया) तथा पुष्पकलावती (चारसदूदा) तो भारत कँ ही थे । वाल्होक के कांकायन तथा पुष्कलावती के पौष्कलावत जैसे छात्र धन्वन्तरि के शिष्य डी थे । इनके अतिरिक्त मध्य एशिया के _ रेगिस्तान पार के अन्य शिष्य भी उनके विद्यालाय में अवश्य अध्ययन करते रहे होंगे, तभी तो उन्हें धन्वन्तरि पदवी प्राप्त हुईं । औपधेनव, वेतरण, औरभ्र, पौष्कलावत, कावीर्य, मोपुररक्षित और सुश्रुत । इन शिष्यों के नाम तो सुश्रुत ने ही लिखे हैं । व्याख्याकार उल्हण ने निमि, कांकायन, गारर्य और गालब के नाम भी किसी प्रमाणित आधार पर और अधिक लिखे । यह सब व्यक्तिवाची नाम ही नहीं हैँ, प्रत्युत देशवाची सर्वनाम भी हैं । पौष्कलावत, गोपुररक्षित, औंरभ्र आदि उन-उन देशवासियों के विशेषण ही हैं । पुष्कलावती तथा वाल्दीक के आगे का “धन्व’ मध्य एशिया का असीस्पिरुस्याम तथा नमक के रेगिस्तान ही होना चाहिए । इसीलिए सुश्रुत के व्याख्याकार आचार्य उल्हण ने लिखा है कि “धक्ली शब्द संज्ञा नहीं, विशेषण हे 3 उनका नाम तो दिवोदास था ।3 और मूल ‘धन्वन्तरि तो उसके संस्थापक ही थे ।

व्याख्याकार उरुहण ने ‘धत्त्व’ शब्द को भिन्न प्रकार से विश्लेषित विध्या । धनु+ अंतचं’इयर्लि-मृधन्वन्तरि । इस प्रकार पदृच्छेद करके लिखा कि धनु का अर्थ शल्यशात्व होता है । उस शास्त्र के पारणामी होने से उन्हें धन्वन्तरि पदवी मिली । जो भी हो; धन्वन्तरि एक विरुद है संज्ञा नहीं ।

. धन्वन्तरि के जन्मकाल में आर्यावर्त कै वैज्ञानिकों में दो संप्रदाय थे-प्रधम ब्रह्मर्षि कूदाय । आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में जहाँ महर्षियों की बड्रीच्चिबडी परिषदों का उल्लेख

है, उनमें ‘ब्रह्मर्षि’ और ‘राजर्षि’ इस प्रकार विशिष्ट नामों का उल्लेख हैं । प्रतीत होता है बहुमत ब्रह्मर्षियों का था । बहुमत की प्रतिष्ठा ही सामाजिक प्रतिष्ठा होती हे । वह . ब्रह्मर्षियों क्रो प्राप्त थी । इसीलिए राजवंश में जन्ग लेनेवाले विश्वामित्र को राजर्षि से ब्रह्मर्षि होने की अभिलाषा में अनेक तप करने पड़े । ब्रह्मर्षियों का बहुमत कितना भी अधिक रहा हो, काशी, पांचाल, मिथिला और कान्यकुज्ज के राजर्षियों का भी विद्वानों में एक ऊँचा स्थान हे । विज्ञान, अध्यात्म, राजनीति और समाजशास्त्र में वे जो कुछ कर गए, उसका उज्जल प्रकाश भारतीय इतिहास में आज भी आलोकित है । उनके दरबारों में भी भगवती सरस्वती की वीणा से रस माधुरी प्रवाहित हुई है । प्रतीत ढोता है एक-एक राजर्षि को ध्यान में रखकर ही महाकवि श्रीहर्ष ने लिखा कि उनके दो नेत्र तो सर्वसाधारण की भाँति ये ही, ज्ञान का तृतीय नेत्र धारण करने के कारण डी वे ‘त्रिलोचन‘ का अवतार बन गए थे 3

धन्वन्तरि, दिवोदास, प्रतर्दन, वार्योंविद, वामक, ब्रह्मदत्त आदि काशी के राजवंश के ही स्वनामघन्य राजर्षि थे । दूसरी ओर अत्रि, भृगु, वसिष्ठ, गौतम, वामदेव, शौनक पाराशर्य, मार्कण्डेय और सुभूति गोतम आदि क्तिने ही धुरंधर ब्रह्मर्षि भी हुए,2 परंतु उन ब्रह्मर्षियों से इन राजर्षियों का ज्ञान और सेवाएँ इतनी उत्कृष्ट सिद्ध हुई कि ” -उन्होंने न केवल वसुधा पर ही बल्कि जनता के ह्रदय पर भी शासन पा लिया । तभी तो राष्ट्र ने उन्हें भगवदूप में संपूजित किया । प्रत्येक परिवार उनके नाम से नित्यप्रति एक आहुति देने लगा । ब्रह्मर्षि यिद्धत्सभाओं में पूजित हुए और धन्वन्तरि घर-घर में ।

वेदिक सिद्धांतों की गूढ व्याख्याएँ जब ब्राह्मण ग्रंथों में संकलित हो रहीँ यीं काशी कै राजर्षि ब्रह्मवेत्ताओं में प्रमुख शास्ता थे । बृहदारण्यक उपनिषद में लिखा डै3-गर्ग गोत्रीय बालाकि ब्रह्मविद्या के मर्मज्ञ होने का घमंड लेकर काशी के सम्राट अजातशत्रु कै दरबार में जा पहुंचा । सम्राट ने दर्प से भरे बालाकि से आदरपूर्वक पूछा

‘ब्राह्मण ३ मेरी राजसभा में आने का कारण बताइए ।’

‘राजन १ तुम्हें ब्रह्म का रहस्य बताऊँगा ।’

‘गोवें पाने के लिए ब्रह्मवेत्ता जनक की और दौडते हैं । में भी तुम्हें एक सहस्र गौबें दूँगा यदि तुम ब्रह्म का रहस्य बताओगे ।’

बालाकि ब्रह्मा’ड की व्याख्या करने लगा । अजातशत्रु ने व्याख्या ध्यान से सुनी ।

भगवान् धन्वन्तरि

भगवान् धन्वन्तरि

दूसरों कं लिए सेवाव्रत लेकर अपने जीवन को बलिदान करने वाले महापुरुषों को भारतीयों ने “भगवान्’ की उपाधि देकर सम्मानित किया है । सेवक होना सबसे ऊँची भावना हे । यह योग और समाधि से प्राप्त होनेवाली वस्तु नहीँ है । र्कितु सत्य यह हे कि योग सिद्धि का द्धार भक्ति है, और भस्ति निस्वार्थ सेवा कै बिना संभव नहीं । योगी भगवदूदशंन की लालसा में दिन-रात घुला रहता है । परंतु सेवक लालसाओं को लात मारकर जिस ऊँचे अनुष्ठान का आचरण करता है, उसे इन शब्दों मेंहीँ कहा जा सकता था…

‘ सेवाधर्मदृ परमगहनो वोगिनामप्यगम्यद्र ।

सचमुच सेवाधर्म के अगम्य और गहनगिरि पर चढ़नेवाले सेवकों का स्थान भगवान् से कम नहीं । यद्यपि सेवा क्रो हमारे पूजोचित सामान और सम्मान की आकांक्षा सर्वथा नहीं होती, तो भी उसके चरणों में अपनी श्रद्धा की भावना का नैवेद्य चढाकर हम आत्मसंतोष संपादन करते हैं । संसार-सेवियों की उन्हीं महान आत्माओं में भगवान धन्वन्तरि का नाम भी है । उन्ही की पावन कथा हम यहाँ पर कहने चले हैं ।

आवालवृद्ध भारतीय काशी क्रो आज भी पूज्य दृष्टि से देखते हैँ । वह ऐसा पुण्य तीर्थ हे जहॉ जीवन की लीला संवरण मात्र से व्यक्ति मोक्ष पा लेता है, फिर चाहे वह कितना भी अधम जीवन-यापन करता रहा हो । आज भी पुरोहित और पंडित काशी का गौरव गान करते समय ‘काश्या मरणान्मुक्ति८” कहना नहीं भूलते । काशी का गुणगान करने के लिए ही पुराणों में विस्तृत ‘काशीखंइ’ क्री रचना हुई थी । काशी पर विश्वनाथ भगवान शिवशंकर की जो कृपादृष्टि है वह दूसरों को दुर्लभ है । धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक अथवा राजनैतिक किसी भी वृष्टि से देखिए, जब तक काशी का उल्लेख नहीं, भारत का इतिहास अपूर्ण है । भगवान् धन्वन्तरि ने काशी की गोद में जन्म लेकर यह महान् गौरव उसे प्रदान किया था ।

यह घटना अब से कितने वर्ष पूर्ब हुई थी, यह तो ठीक-ठीक नहीं कडा जा सकता । अनुमान है कि ईसा से लगभग दस हजार वर्ष पूर्व भगवान धन्वन्तरि ने काशी को अपनी चरण-रज से पवित्र किया था । धन्वन्तरि काशी के सम्राट महाराज “धन्व’ कं पुत्र थे ।

काशी उन दिनों मामूली नहीं, वल्कि आर्यों के मठान् राज्यों में एक समझा जाता था । कौसल और मगध कै मध्य में काशी राज्य था । यह तीनों जनपद मिलकर प्राचीन

भारत के मध्यदेश कहे जाते थे और उनके निवासी माध्यमिक । पतंजलि ने महाभाष्य में मध्यदेशवासियों पर किसी (संभवत्ता मीनेद्र) यवन राजा के आक्रमण का उल्लेख भी किया है । परंतु यहाँ हम पतंजलि से बहुत पहले की बात कह रहे हैं । तब काशी एक स्वतंत्र राष्ट्र था । काशी राज्य ओर ‘उसकी राजधानी वाराणसी भारतीय इतिहास के प्रातदृस्मरणीय नाम हैँ । उनका शासक न केवल प्रजा पर बल्कि विद्या और विज्ञान पर भी शासन करता रहा है ।

धन्वन्तरि ने भी भौतिक .धन३-संपत्ति के आधार पर ही नहीं, बल्कि अपने वंश की परंपरा के अनुसार विद्या और बिज्ञान के आधार पर सम्राट का गौरव स्थापित किया । अपने ज्ञान और शक्ति द्वारा संसार की सेवा करना ही उनके वंश का अखंड व्रत रहा । इस व्रत क्रो पूर्ण करने में महाराज धन्वन्तरि ने सिद्धि क्रो पराकाष्ठा तक पहुँचा दिया । इसीलिए भारतीयों ने अपनी भावना का सबसे उच्व सम्मान उनके चरणों में अर्पित किया । तव से लेकर आज तक हम धन्वन्तरिं को केवल सम्राट कं रूप में नहीं बल्कि ‘भगवान’ कं रूप मेँ पूजते आते हैं ।1.

प्राचीनकाल में समाज के महान सेवकों को सम्मानित करने का एक प्रकार यह था कि उस व्यक्ति को ‘यज्ञ-भाग” प्रदान किया गया । ‘यज्ञ-भाग’ प्रदान करने की विधि यह यी कि उस महापुरुष के नाम से यज्ञ में आहुति डाली जाती धी 3 भगवान धन्वन्तरि को भी वह महान गौरव प्राप्त हुआ था । वैदिक देव-पूजा ‘में जहाँ अन्य देवताओं का नाम लिया जाता हे, वहाँ धन्वन्तरि के नाम से भी एक आहुति अवश्य दी जाती है । कश्यप और आत्रेय ने अपनीन्धापनी संहिताओं में धन्वन्तरि कं लिए आहुति देने का विधान लिखा है 3 अग्नि, सोम, प्रजापति, कश्यप, अस्थि, इंद्र और सरस्वती के साथ धन्वन्तरि के नाम से भी एक आहुति छोडे बिना यज्ञ-विधि पूर्ण नहीं होती । नित्य कर्म कै पंचमहायज्ञों में “बतिवेश्च देव-यज्ञ’ भी आवश्यक है । यह यज्ञ तब तक पूर्ण नहीं होता जव तक धन्वन्तरि के नाम से भी आहुति न दी जाए । मानव धर्मशास्त्र में प्रत्येक गृहस्थ कै लिए प्रतिदिन यह यज्ञ आवश्यक हे ।4 इस प्रकार हम देखते हैँ

व्या…